भारतीय साहित्य की धरोहर में ऐसे चरित्र आते हैं जो सदियों बाद भी पाठकों के मन को छू जाते हैं। इलंगो अडिगल की महाकाव्य कृति शिलप्पदिकारम की कन्नगी और कालिदास की अमर नाट्य कृति अभिज्ञानशाकुंतलम की शकुंतला – ये दो नायिकाएँ एक-दूसरे से बिल्कुल अलग पृष्ठभूमि की हैं, फिर भी दोनों में वीरता, दिव्य सौंदर्य और मानवीय भावनाओं का अद्भुत संगम है। एक न्याय की आग बनी शहर जलाती है, दूसरी प्रेम और धैर्य की मिसाल बनकर स्वर्गीय पुनर्मिलन पाती है।
कन्नगी: पतिव्रता से रोषाग्नि तक की यात्रा
शिलप्पदिकारम तमिल साहित्य का महान ग्रंथ है, जो प्रेम, विश्वासघात, अन्याय और प्रतिशोध की कहानी बयां करता है। कन्नगी, कोवलन की पत्नी, एक साधारण गृहिणी के रूप में शुरू होती है। पति के मधवी (नर्तकी) के प्रति आकर्षण और धन के नुकसान के बावजूद वह चुपचाप साथ निभाती है। जब कोवलन को मदुरै में गहने चोरी के झूठे आरोप में फाँसी दे दी जाती है, तब कन्नगी की चुप्पी फट जाती है।वह राजसभा में पहुँचकर अपना एक पैर का कंगन दिखाती है और सत्य का प्रमाण देती है। जब राजा अन्याय स्वीकार कर लेता है, तब कन्नगी का रोष फूट पड़ता है। उसकी आँखों की ज्वाला से पूरा मदुरै शहर जल उठता है! वह पतिव्रता की मिसाल तो है ही, साथ ही अन्याय के खिलाफ बगावत की प्रतीक भी बन जाती है। बाद में वह देवी के रूप में पूजी जाती है – पत्तिनी देवी के नाम से।
कन्नगी में heroism का रूप क्रोध और न्याय की मांग में नजर आता है। वह न केवल पत्नी है, बल्कि समाज के नैतिक दर्पण की तरह खड़ी हो जाती है।शकुंतला: प्रकृति की पुत्री, प्रेम की देवीकालिदास की शकुंतला महाभारत की कथा पर आधारित है, लेकिन कवि ने इसे अपनी कल्पना से और भी सुंदर बना दिया। शकुंतला, विश्वामित्र और मेनका की पुत्री, कण्व ऋषि के आश्रम में पली-बढ़ी। प्रकृति उसके लिए परिवार है – फूलों से आभूषण, पेड़-पौधे उसके मित्र।राजा दुष्यंत आश्रम में आते हैं और दोनों का गंधर्व विवाह हो जाता है। दुरासा ऋषि का शाप, स्मृति भूलना, अलगाव और अंत में अभिज्ञान (अंगूठी) से पुनर्मिलन – यह पूरी कहानी प्रेम की कोमलता, धैर्य और भाग्य की लीला को दर्शाती है। शकुंतला का सौंदर्य कालिदास ने प्रकृति की उपमाओं से वर्णित किया है – कमल, लता, फूल, मृग – सब उसमें समाए हैं। वह कोमल है, किंतु विपत्ति में भी अपनी गरिमा नहीं खोती।
दोनों नायिकाओं में अनोखी समानता
दिव्य सौंदर्य और मानवीयता: दोनों ही दिव्य वंश की हैं। शकुंतला अप्सरा मेनका की पुत्री, कन्नगी की पवित्रता देवत्व को छूती है। दोनों का सौंदर्य आंतरिक चरित्र से निकलता है।
वीरता का अलग रूप: शकुंतला में धैर्य और प्रतीक्षा की वीरता है, जबकि कन्नगी में क्रोध और संघर्ष की। एक प्रेम की रक्षा करती है, दूसरी न्याय की।
भारतीय नारी आदर्श: दोनों पत्नी, माँ और शक्ति की प्रतीक हैं। वे पौराणिक कथाओं की तरह मानव जीवन के सवालों – प्रेम, विवाह, अन्याय, भाग्य – को छूती हैं।
साहित्यिक प्रभाव: दोनों कृतियाँ भारतीय संस्कृति को आकार देती हैं। शिलप्पदिकारम तमिल गौरव का प्रतीक, जबकि अभिज्ञानशाकुंतलम संस्कृत साहित्य का रत्न।
ये दोनों नायिकाएँ हमें सिखाती हैं कि स्त्री शक्ति कोमल भी हो सकती है और प्रचंड भी। एक शहर जला देती है तो दूसरी प्रेम से साम्राज्य खड़ा कर देती है।आज के समय में जब न्याय और प्रेम दोनों ही चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, कन्नगी और शकुंतला हमें याद दिलाती हैं – सत्य की ज्योति कभी बुझती नहीं, और प्रेम की राह कभी व्यर्थ नहीं जाती।आपकी राय क्या है? कन्नगी की तरह अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा लें या शकुंतला की तरह धैर्य और विश्वास रखें?
References
Roshan B. A love triangle with an epic twist, The New Indian Express [online] https://www.newindianexpress.com/cities/chennai/2017/apr/12/a-love-triangle-with-an-epic-twist-1592941.html
