भारतीय सिनेमा लंबे समय तक उन अनुभवों को हाशिए पर रखता रहा है जो सामाजिक “सामान्यता” की परिभाषाओं को चुनौती देते हैं। विशेषतः विकलांगता और यौनिकता—ये दोनों ऐसे क्षेत्र रहे हैं जिनके बारे में या तो मौन साध लिया गया या उन्हें रूढ़ धारणाओं के भीतर सीमित कर दिया गया। ऐसे परिदृश्य में मर्गरीटा विद अ स्ट्रॉ (2014) केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप के रूप में उभरती है, जो दर्शकों को उन प्रश्नों से रूबरू कराती है जिनसे भारतीय समाज अक्सर बचना चाहता है। In general, Indian society does not want to discuss issues related to विकलांगता (Disability), यौनिकता (sexuality)
क्या विकलांग शरीर को इच्छा रखने का अधिकार है?
फिल्म की नायिका लैला, जो सेरेब्रल पाल्सी से ग्रस्त है, अपने जीवन में प्रेम, आकर्षण, यौन जिज्ञासा और आत्म-पहचान की तलाश करती है। यह खोज केवल व्यक्तिगत नहीं है; यह उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष है जो विकलांग शरीर को अक्सर “अलैंगिक” या “निर्दोष” मानकर उसकी इच्छाओं को नकार देती है।
फिल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य तब सामने आता है जब लैला की माँ उसकी निजी डिजिटल दुनिया में हस्तक्षेप करते हुए उसकी यौन जिज्ञासाओं का सामना करती है। यह क्षण केवल माँ-बेटी के रिश्ते में तनाव नहीं पैदा करता, बल्कि उस व्यापक सामाजिक मानसिकता को उजागर करता है जो विकलांग व्यक्तियों की यौन स्वायत्तता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
दृष्टि का प्रश्न: कौन किसे देख रहा है?
फिल्म बार-बार दर्शकों को यह सोचने पर विवश करती है कि विकलांगता को देखने का हमारा नजरिया कैसा है। लैला को अक्सर दूसरों की निगाहों से परिभाषित किया जाता है—एक बेटी, एक रोगी, एक जिम्मेदारी। लेकिन जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, वह स्वयं अपनी इच्छाओं और पहचान की निर्माता बनना चाहती है।
यहीं फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप निहित है। यह विकलांगता को दया या प्रेरणा की कहानी के रूप में प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि उसे मानवीय अनुभवों की जटिलता के भीतर स्थापित करती है, जहाँ प्रेम, असुरक्षा, आकर्षण और अस्वीकार—सभी समान रूप से मौजूद हैं।
क्वियर पहचान और भारतीय सिनेमा का बदलता परिदृश्य
भारतीय लोकप्रिय सिनेमा में गैर-हेटेरोनॉर्मेटिव यौनिकताओं का इतिहास अक्सर उपहास, विकृति या सनसनीखेज प्रस्तुति से जुड़ा रहा है। फायर जैसी फिल्मों ने इस चुप्पी को तोड़ने का प्रयास किया था, किंतु उन्हें तीव्र सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ा।
इसके विपरीत, मर्गरीटा विद अ स्ट्रॉ अपेक्षाकृत अधिक स्वीकार्यता प्राप्त करती है। इसका एक कारण यह है कि फिल्म समलैंगिक और उभयलिंगी अनुभवों को वैश्विक, विशेषकर अमेरिकी परिवेश में विकसित होते हुए दिखाती है। इससे भारतीय दर्शक और पात्रों के बीच एक सांस्कृतिक दूरी निर्मित होती है, जो विवाद की तीव्रता को कम कर देती है।
लेकिन यही बिंदु एक गंभीर प्रश्न भी उठाता है—क्या फिल्म अनजाने में समलैंगिकता को “पश्चिमी प्रभाव” के रूप में प्रस्तुत करती है?
नवउदारवाद की स्वतंत्रता: मुक्ति या नया बंधन?
फिल्म का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम नवउदारवादी समाज की भूमिका है। दिल्ली से न्यूयॉर्क तक लैला की यात्रा केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं है; यह दो अलग-अलग राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के बीच की यात्रा है।
अमेरिका में लैला को बेहतर सार्वजनिक सुविधाएँ, तकनीकी सहायता और अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त होती है। पहली दृष्टि में यह एक मुक्ति का अनुभव प्रतीत होता है। लेकिन गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह स्वतंत्रता भी कुछ शर्तों पर आधारित है।
नवउदारवादी व्यवस्था विकलांग व्यक्तियों को स्वीकार तो करती है, परंतु तब जब वे उत्पादक, आत्मनिर्भर और उपभोक्ता बनने की क्षमता रखते हों। इस प्रकार समावेशन भी एक नई प्रकार की सामाजिक छंटनी का हिस्सा बन जाता है।
माँ, परिवार और ‘सामान्य’ भविष्य का सपना
फिल्म में लैला की माँ का चरित्र विशेष रूप से जटिल है। वह प्रेमपूर्ण है, संघर्षशील है, लेकिन साथ ही वह उस सामाजिक कल्पना का प्रतिनिधित्व भी करती है जो अपनी संतान के लिए एक “सामान्य” भविष्य चाहती है।
यहीं विकलांगता, यौनिकता और मातृत्व के बीच तनाव पैदा होता है। लैला की उभयलिंगी पहचान माँ के उस भविष्य-दर्शन को चुनौती देती है जो विवाह, प्रजनन और पारंपरिक पारिवारिक संरचना पर आधारित है। इस प्रकार परिवार स्वयं नियंत्रण और निगरानी की एक संस्था के रूप में उभरता है।
आत्म–खोज की यात्रा या उपभोक्तावादी पहचान?
फिल्म के अंतिम हिस्से में लैला अधिक आत्मविश्वासी और स्वतंत्र दिखाई देती है। लेकिन यह स्वतंत्रता एक दिलचस्प प्रश्न छोड़ जाती है। क्या उसकी आत्म-स्वीकृति वास्तव में व्यक्तिगत मुक्ति का परिणाम है, या वह नवउदारवादी संस्कृति द्वारा निर्मित उपभोक्तावादी आत्म-निर्माण का हिस्सा बन चुकी है?
फिल्म इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं देती। शायद यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
निष्कर्ष: हाशिए की आवाज़ों को केंद्र में लाने वाली कथा
मर्गरीटा विद अ स्ट्रॉ विकलांगता, क्वियर पहचान और स्त्री यौनिकता के अंतर्संबंधों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ सामने लाती है। यह फिल्म केवल प्रतिनिधित्व का विस्तार नहीं करती, बल्कि उन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचनाओं को भी प्रश्नांकित करती है जो यह तय करती हैं कि किसे प्रेम करने, इच्छा रखने और अपनी पहचान गढ़ने का अधिकार है।
आज जब समावेशन और विविधता की भाषा तेजी से लोकप्रिय हो रही है, यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि वास्तविक स्वतंत्रता केवल दृश्यता से नहीं आती; वह तब आती है जब समाज किसी व्यक्ति की इच्छाओं, आकांक्षाओं और स्वायत्तता को समान मानवीय गरिमा के साथ स्वीकार करे।
और शायद यही मर्गरीटा विद अ स्ट्रॉ का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है—विकलांगता शरीर की सीमा हो सकती है, लेकिन इच्छा और पहचान की नहीं।
At the end, a critical engagement with विकलांगता Disability), कामुकता (Sexuality) और नवउदारवादी स्वतंत्रता (Neo-liberal Freedom) reveals how contemporary discourses of inclusion, desire, and individual agency are deeply shaped by broader social, economic, and political structures, demanding more nuanced and intersectional approaches to justice and empowerment.
Chandra, S. 2026
References
Addlakha, R., Price, J., & Heidari, S. (2017). Disability and sexuality: claiming sexual and reproductive rights. Reproductive Health Matters, 25(50), 4-9.
Creed, B. Horror And The Monstrous Feminine: An Imaginary Abjection. London Routledge, 1993. 1-15, 60-65
Edelman, L. (1994). Homographesis: Essays in Gay Literary and Cultural Theory (1st ed.).
Fine, M., & Asch, A. (2018). Disabled women: Sexism without the pedestal. In Women and Disability (pp. 6-22). Routledge.
Foucault, M. (1991). Governmentality. In G. Burchell, C. Gordon, & P. Miller (Eds.), The Foucault Effects: Studies in Governmentality (pp. 87-104). London: Harvester Wheatsheaf.
Garland-Thomson, R. (2020). Integrating disability, transforming feminist theory. In Feminist Theory Reader (pp. 181-191).Routledge.
Kristeva, J. Powers Of Horror: An Essay On Abjection. Columbia University Press, 1982. Pp 2-7
La France, M. & Mayo, C. (1979). A review of nonverbal behaviors of women and men. Western Journal of Speech Communication, 43, pp. 96-107. • Margarita with a Straw. Directed by Shonali Bose, Viacom 18 Motions picture, 2014.
McRuer, R (2017): “The World-Making Potential of Contemporary Crip/Queer Literary and Cultural Production,” in The Cambridge Companion to Literature and Disability, Cambridge: University Press. McRuer, R and A Mallow (2012): Sex and Disability, Duke University Press Books, Washington. • Shildrick, M. 2007. Contested Pleasures: The Sociopolitical
The economy of Disability and Sexuality, Sexuality Research & Social Policy Journal of NSRC, 4(1), pp. 53-66.
Titley, R. & Viney, W. 1969. Expression of aggression toward the physically handicapped. Perceptual and Motor Skills, 29(1), pp. 51-56.
