माँ…
यह शब्द सुनते ही हमारे मन में एक निश्चित तस्वीर उभरती है—निस्वार्थ प्रेम, त्याग, ममता और अंतहीन करुणा। साहित्य हो, सिनेमा हो या धार्मिक आख्यान—माँ को लगभग हमेशा एक आदर्श के रूप में चित्रित किया गया है। लेकिन क्या कभी हमने यह जानने की कोशिश की है कि उस स्त्री के भीतर क्या घटता है, जो माँ बन रही होती है?
क्या गर्भ धारण करना केवल जीवन को जन्म देना है, या यह स्वयं के एक हिस्से को खो देने की शुरुआत भी है?
यही वह प्रश्न है जिसे साहित्य ने सदियों तक या तो टाल दिया, या फिर इतने आदर्शवादी ढंग से प्रस्तुत किया कि माँ का वास्तविक अनुभव कहीं पीछे छूट गया।
गर्भ—आश्रय या कैद?
अठारहवीं शताब्दी की अंग्रेज़ी कवयित्री एना लेटिशिया बारबॉल्ड अपनी कविता To a Little Invisible Being Who Is Expected Soon to Become Visible में अजन्मे शिशु से संवाद करती हैं। पहली नज़र में यह कविता मातृत्व का उत्सव लगती है, लेकिन धीरे-धीरे इसका स्वर बदलने लगता है।
बारबॉल्ड गर्भ को केवल जीवन का उद्गम नहीं कहतीं; वह उसे एक ऐसी जगह भी कहती हैं जो कभी-कभी “जीवित कब्र” (Living Tomb) और “कारागार” जैसी प्रतीत होती है, जिसके द्वार अंततः टूटने ही होते हैं।
यह चित्रण चौंकाता है।
क्योंकि पहली बार गर्भ को केवल पवित्रता के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे अनुभव के रूप में देखा जाता है जहाँ स्त्री का शरीर किसी और जीवन का घर बनते-बनते स्वयं उसके लिए अपरिचित होने लगता है।
यहीं से मातृत्व की वह कहानी शुरू होती है जिसे हमने लंबे समय तक सुनने से इंकार किया।

मातृत्व का सबसे बड़ा विरोधाभास
दुनिया के लगभग हर दर्शन ने “मैं कौन हूँ?” जैसे प्रश्न पूछे हैं।
लेकिन बहुत कम दार्शनिकों ने यह पूछा कि जब एक स्त्री के भीतर दूसरा जीवन जन्म ले रहा होता है, तब उसका “मैं” कहाँ चला जाता है?
गर्भावस्था शरीर और आत्म की सीमाओं को धुंधला कर देती है। माँ और शिशु दो अलग अस्तित्व होते हुए भी एक ही शरीर में रहते हैं। यहाँ ‘स्व’ और ‘दूसरे’ का अंतर टूटने लगता है।
विडंबना यह है कि दर्शन और समाज ने इस जटिल अनुभव को समझने के बजाय अक्सर स्त्री के शरीर को नियंत्रित करने की कोशिश की—उसे नियमों, नैतिकताओं और आदर्शों से बाँध दिया।
माँ के अनुभव को सुनने के बजाय उसके लिए आदर्श गढ़ दिए गए।
क्या हर माँ अपने बच्चे से तुरंत प्रेम करती है?
यह प्रश्न असहज है।
शायद इसलिए क्योंकि हमारा समाज इसका उत्तर सुनना ही नहीं चाहता।
आलोचक बारबरा जॉनसन लिखती हैं—
“यह विचार कि एक माँ अपने बच्चे से घृणा कर सकती है, उससे डर सकती है या उसे अस्वीकार कर सकती है, मनोविश्लेषण के सबसे अधिक दबा दिए गए सत्यों में से एक रहा है।”
हम ऐसे पात्रों को स्वीकार कर लेते हैं जो पिता होने से डरते हैं, प्रेम से भागते हैं या परिवार छोड़ देते हैं। लेकिन यदि कोई माँ अपने नवजात शिशु को देखकर भय, दूरी या अस्वीकार का अनुभव करे, तो समाज उसे अस्वाभाविक घोषित कर देता है।
सवाल यह नहीं कि ऐसा होता है या नहीं।
सवाल यह है कि इसके बारे में बात क्यों नहीं की जाती?
“दो साल तक वहाँ मैं थी ही नहीं“
अमेरिकी कवयित्री ऐलिस नॉटली मातृत्व के शुरुआती वर्षों को केवल एक वाक्य में समेट देती हैं—
“दो वर्षों तक वहाँ ‘मैं’ थी ही नहीं।”
शायद मातृत्व के अनुभव को इससे बेहतर कोई पंक्ति व्यक्त नहीं कर सकती।
माँ बनने के बाद केवल एक शिशु जन्म नहीं लेता।
एक स्त्री का समय बदल जाता है।
उसकी नींद, उसका शरीर, उसका अकेलापन, उसका काम, उसकी भाषा—सब कुछ बदलने लगता है।
धीरे-धीरे समाज की निगाहें केवल बच्चे पर टिक जाती हैं।
माँ पृष्ठभूमि बन जाती है।
उसका शरीर अब एक व्यक्ति नहीं, बल्कि किसी दूसरे जीवन का माध्यम बनकर रह जाता है।
समय भी बदल जाता है
लेखिका सारा मंगुसो अपनी पुस्तक Ongoingness में लिखती हैं कि मातृत्व केवल शरीर नहीं बदलता, समय का अनुभव भी बदल देता है।
माँ बनने से पहले समय भविष्य की योजनाओं, महत्वाकांक्षाओं और स्मृतियों में बहता है।
माँ बनने के बाद समय घंटों में नहीं, बल्कि दूध पिलाने, रोने, सोने और जागने के चक्रों में मापा जाने लगता है।
दिन अंतहीन लगते हैं।
साल कब बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता।
ऐसा लगता है जैसे माँ स्वयं समय बन गई हो।
साहित्य अब सच बोलने लगा है
समकालीन लेखिकाएँ—सारा मंगुसो, एलिसा अल्बर्ट, रेचल कस्क, मैगी नेल्सन और अनेक अन्य—मातृत्व के उस चेहरे को सामने ला रही हैं जिसे लंबे समय तक छिपाया गया।
उनके यहाँ माँ केवल त्याग की मूर्ति नहीं है।
वह थकती है।
घबराती है।
अपनी पुरानी पहचान को खोजती है।
कभी-कभी अपने बच्चे से दूरी भी महसूस करती है।
और फिर भी प्रेम करती है।
यही विरोधाभास मातृत्व को मानवीय बनाता है।
आखिर यह कहानी इतनी ज़रूरी क्यों है?
जब हम मातृत्व की केवल सुंदर तस्वीरें देखते हैं, तब हम लाखों स्त्रियों के वास्तविक अनुभवों को अदृश्य बना देते हैं।
यदि कोई माँ अपने भीतर टूटन, अकेलापन, भय या अस्वीकार का अनुभव करती है, तो वह स्वयं को दोषी समझने लगती है—क्योंकि समाज ने उसे बताया है कि “अच्छी माँ” केवल प्रेम करती है।
लेकिन साहित्य हमें एक अलग संभावना देता है।
वह कहता है कि माँ भी मनुष्य है।
उसका प्रेम भी जटिल हो सकता है।
उसकी थकान भी वास्तविक है।
उसका भय भी वैध है।
और उसका शरीर केवल जन्म देने का साधन नहीं, बल्कि अनुभव, संघर्ष, पहचान और अस्तित्व का एक जीवंत भूगोल है।
शायद अब समय आ गया है कि हम मातृत्व को केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि समझ का विषय बनाएँ।
क्योंकि जब तक हम माँ की आवाज़ नहीं सुनेंगे, तब तक हम जन्म की कहानी तो जानते रहेंगे—लेकिन उस स्त्री की कहानी कभी नहीं जान पाएँगे, जिसने उसे संभव बनाया।
यदि साहित्य ने हमें कुछ सिखाया है, तो वह यह कि माँ होना केवल किसी और को जन्म देना नहीं, बल्कि स्वयं को बार-बार नए रूप में जन्म देना भी है।
Chandra, D. 2026
References
Barbauld, Anna Letitia. Anna Letitia Barbauld: Selected Poetry and Prose. Eds. William McCarthy and Elizabeth Kraft. Ontario: Broadview P, 2002.
Johnson, Barbara. “My Monster/My Self.” Diacritics, vol. 12, no. 2, 1982, pp. 2–10. JSTOR, https://doi.org/10.2307/464674. Accessed 20 Oct. 2024.