जब राजा ने आईना खरीदा: गोदी मीडिया की एक चौसरियाई कथा
एक बार की बात है, राजधानी में एक बहुत महान राजा रहता था।
इतना महान कि उसके दरबार में सूरज भी उगने से पहले अनुमति लेता था।
उसके मंत्री महान।
उसकी योजनाएँ महान।
उसके भाषण महान।
और सबसे महान था—
उसका मीडिया।
राजा ने एक दिन अपने दरबारियों से पूछा,
“बताओ, मेरे राज्य में सबसे बुद्धिमान व्यक्ति कौन है?”
दरबारी झुक गए।
“महाराज, आप।”
राजा मुस्कुराया।
“और सबसे बहादुर?”
“आप।”
मुस्कान थोड़ी चौड़ी हुई।
“सबसे दूरदर्शी?”
“आप।”
अब राजा ने आईने की ओर देखा।
आईने ने कुछ नहीं कहा।
राजा को पहली बार संदेह हुआ।
तभी दरबार का प्रधान समाचारवाचक दौड़ता हुआ आया।
“महाराज! चिंता की कोई बात नहीं। हमने आईने पर भी एक विशेष कार्यक्रम कर दिया है।”
“क्या?”
“‘आईना देशद्रोही क्यों है?’ आज रात नौ बजे।”
राजा प्रसन्न हुआ।
और उसी दिन से राज्य में सत्य का संकट समाप्त हो गया।
समाचार का नया स्वर्णयुग
राजधानी के सबसे बड़े समाचार-महल में सुबह से ही चहल-पहल थी।
दीवार पर लिखा था—
“जहाँ प्रश्न समाप्त होते हैं, वहीं राष्ट्रवाद शुरू होता है।”
अंदर एंकर तैयार हो रहे थे।
एक एंकर के सामने पाँच टेलीप्रॉम्प्टर थे।
पहले पर लिखा था:
“सरकार की उपलब्धियाँ।”
दूसरे पर:
“विपक्ष की विफलताएँ।”
तीसरे पर:
“राष्ट्र संकट में।”
चौथे पर:
“विशेषज्ञ ने सरकार की प्रशंसा की।”
पाँचवें पर कुछ नहीं था।
वह सिर्फ़ सजावट के लिए था।
एक नए पत्रकार ने पूछा,
“सर, इस पाँचवें पर कुछ लिखा क्यों नहीं है?”
संपादक ने उसे घूरकर देखा।
“बेटा, वह सवाल पूछने के लिए था।”
“तो?”
“पिछले साल से बंद पड़ा है।”
महान बहस का जन्म
रात नौ बजे राष्ट्र के सामने एक महान बहस प्रस्तुत की गई।
विषय था:
“क्या आज सुबह बारिश इसलिए हुई क्योंकि सरकार ने अर्थव्यवस्था को मजबूत किया?”
स्टूडियो में चार मेहमान बैठे थे।
पहला सरकार समर्थक।
दूसरा सरकार का समर्थक।
तीसरा भी सरकार का समर्थक।
और चौथा विपक्ष से था।
लेकिन वह सिर्फ़ इसलिए बुलाया गया था ताकि एंकर उसे बीच में रोक सके।
एंकर ने गरजकर पूछा,
“आपको सरकार की इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर क्या कहना है?”
विपक्षी ने कहा,
“लेकिन बारिश तो मौसम विभाग के अनुसार—”
“एक मिनट!”
एंकर ने मेज़ पर हाथ मारा।
“आप देश के खिलाफ़ क्यों हैं?”
विपक्षी चौंका।
“मैं तो बारिश की बात कर रहा हूँ।”
“यही समस्या है!”
एंकर कैमरे की ओर मुड़ा।
“जब देश विकास की बारिश में भीग रहा है, कुछ लोग मौसम पर सवाल उठा रहे हैं।”
तालियाँ बजाने वाला कोई नहीं था।
इसलिए चैनल ने स्वयं तालियों की आवाज़ चला दी।
Chaucer अगर आज होते…
Chaucer शायद इस दृश्य को देखकर प्रसन्न होते।
उन्हें The Canterbury Tales के लिए किसी नई तीर्थयात्रा की आवश्यकता नहीं पड़ती।
वे बस एक न्यूज़ स्टूडियो में चले जाते।
वहाँ उन्हें अपना नया “Nun’s Priest” मिल जाता।
और शायद नया Chaunticleer भी।
क्योंकि Chaucer का मुर्गा अपनी आवाज़ पर इतना मुग्ध था कि लोमड़ी की थोड़ी-सी तारीफ़ में आँखें बंद कर बैठा।
आज का गोदी-मीडिया भी कुछ वैसा ही दिखाई देता है।
सत्ता कहती है—
“आप महान हैं।”
चैनल कहता है—
“आप ऐतिहासिक हैं।”
सत्ता कहती है—
“आप विश्वगुरु हैं।”
चैनल कहता है—
“आपने विश्व को दिशा दे दी।”
सत्ता अंततः पूछती है—
“कोई समस्या भी है?”
चैनल कुछ क्षण चुप रहता है।
फिर कहता है—
“जी है।”
“क्या?”
“विपक्ष।”
चापलूसी: लोकतंत्र का नया एंकर
लोमड़ी को पता था कि मुर्गे को कैसे पकड़ा जाए।
उसने जाल नहीं लगाया।
उसने तारीफ़ की।
यही राजनीति और मीडिया के इस विचित्र गठबंधन का सबसे पुराना हथियार है।
सत्ता को हमेशा आलोचक से डर नहीं लगता।
उसे कभी-कभी ऐसे प्रशंसक से अधिक प्रेम होता है जो आलोचना का अभिनय भी न करे।
क्योंकि आलोचक सवाल पूछता है।
चापलूस सवाल को ही उपलब्धि बना देता है।
“महँगाई क्यों बढ़ी?”
चापलूस पूछता है—
“महँगाई से लड़ने के लिए सरकार ने इतने महान कदम उठाए, फिर भी विपक्ष खुश क्यों नहीं?”
“बेरोज़गारी क्यों बढ़ी?”
“सरकार ने युवाओं को इतने अवसर दिए, फिर युवा शिकायत क्यों कर रहे हैं?”
“अस्पतालों की हालत?”
“सरकार की स्वास्थ्य-क्रांति को बदनाम करने की साज़िश कौन कर रहा है?”
इस प्रकार प्रश्न धीरे-धीरे बदल जाता है।
और जब प्रश्न बदल जाए,
तो उत्तर की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है।
एक दिन खबर आई: राजा की मूँछ टेढ़ी है
एक सुबह महल से खबर आई कि राजा की मूँछ थोड़ी टेढ़ी दिखाई दे रही है।
संपादकीय बैठक तुरंत बुलाई गई।
पहला संपादक बोला,
“इसे खबर मत बनाइए।”
दूसरा बोला,
“नहीं, इसे उपलब्धि बनाइए।”
तीसरा बोला,
“विशेष कार्यक्रम करते हैं।”
शीर्षक तय हुआ:
“राजा की मूँछ: क्या दुनिया ने ऐसी शैली पहले कभी देखी है?”
दस विशेषज्ञ बुलाए गए।
एक ने कहा,
“यह मूँछ नहीं, सभ्यता का संकेत है।”
दूसरे ने कहा,
“इतिहास में पहली बार किसी शासक की मूँछ ने इतनी स्पष्ट वैचारिक दिशा दिखाई है।”
तीसरे ने कहा,
“विपक्ष चाहता है कि राजा मूँछ सीधी रखें। यानी विपक्ष परंपरा-विरोधी है।”
चौथे ने कहा,
“विदेशी शक्तियाँ राजा की मूँछ से डरती हैं।”
पाँचवें ने कहा,
“मेरे पास दस्तावेज़ हैं।”
एंकर झुककर बोला,
“क्या दस्तावेज़?”
“अभी नहीं दिखा सकता।”
“क्यों?”
“राष्ट्रीय सुरक्षा।”
और बहस समाप्त।
मूँछ बच गई।
लोकतंत्र भी शायद।
मगर फिर एक समस्या हुई
एक दिन किसी ने सचमुच एक सवाल पूछ दिया।
सवाल बहुत छोटा था।
इतना छोटा कि उसे प्राइम-टाइम में जगह नहीं मिलनी चाहिए थी।
सवाल था—
“अगर सब कुछ इतना अच्छा है, तो फिर सवाल पूछना इतना खतरनाक क्यों है?”
स्टूडियो में सन्नाटा छा गया।
एंकर ने पानी पिया।
फिर कैमरे की ओर देखा।
“आज की हमारी सबसे बड़ी बहस यही है।”
उसने ब्रेक लिया।
वापस आया।
“क्या सवाल पूछने वाले देशद्रोही हैं?”
सवाल पूछने वाला बोला,
“मैंने ऐसा तो नहीं कहा।”
एंकर गरजा,
“लेकिन कहना क्या चाहते हैं?”
“मैं सिर्फ़—”
“आप जवाब क्यों नहीं दे रहे?”
“मैं तो सवाल—”
“यही तो समस्या है!”
और उस रात इतिहास में पहली बार एक चैनल ने साबित किया कि—
सवाल पूछने वाला व्यक्ति जवाब देने के लिए बाध्य है, लेकिन सवाल का जवाब देना चैनल की ज़िम्मेदारी नहीं।
Chaucer का असली सबक
The Nun’s Priest’s Tale में लोमड़ी की सबसे बड़ी ताकत उसके दाँत नहीं थे।
उसकी भाषा थी।
उसने मुर्गे को वही सुनाया जो मुर्गा सुनना चाहता था।
आज भी भाषा सत्ता का सबसे मुलायम हथियार है।
एक शब्द बदल दीजिए—
“विरोध” बन जाता है “साज़िश।”
“आलोचना” बन जाती है “राष्ट्र-विरोध।”
“सवाल” बन जाता है “एजेंडा।”
“जवाबदेही” बन जाती है “अस्थिरता।”
“प्रचार” बन जाता है “राष्ट्रहित।”
और “चापलूसी”—
वह बन जाती है—
“सकारात्मक पत्रकारिता।”
राजा का सबसे बड़ा दुश्मन
अंततः राजा ने अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री से पूछा,
“मेरे राज्य का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है?”
मंत्री ने कहा,
“विपक्ष।”
राजा बोला,
“नहीं।”
“विदेशी ताकतें?”
“नहीं।”
“सोशल मीडिया?”
“नहीं।”
“तो फिर कौन?”
मंत्री ने बहुत देर तक सोचा।
फिर बोला—
“वह पत्रकार जो राजा की तारीफ़ करने से पहले उसकी खबर पढ़ ले।”
राजा कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने पूछा,
“ऐसे पत्रकार कितने हैं?”
मंत्री ने सिर झुका लिया।
“महाराज, जितने हैं, वे अभी टीवी पर नहीं हैं।”
और तभी आईने ने बोलना शुरू किया
कहते हैं उस रात राजा फिर आईने के सामने गया।
उसने पूछा,
“मैं महान हूँ न?”
आईना चुप रहा।
राजा ने फिर पूछा,
“मैं महान हूँ?”
आईना फिर चुप रहा।
राजा क्रोधित हो गया।
“तुम्हें पता है मेरे बारे में पूरा देश क्या कहता है?”
आईने ने पहली बार उत्तर दिया—
“मुझे पता है। मैंने देखा है कि देश ने क्या कहा। लेकिन मुझे यह भी पता है कि किसने उसे बोलने दिया।”
राजा पीछे हट गया।
और अगले दिन राजधानी में एक नई खबर चली—
“आईना संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त: सरकार ने जाँच के आदेश दिए।”
आखिरी बाँग
Chaucer के मुर्गे की त्रासदी यह नहीं थी कि वह मूर्ख था।
वह केवल इतना था कि उसे अपनी ही प्रशंसा पर भरोसा था।
यही लोकतंत्र में मीडिया की सबसे बड़ी परीक्षा भी है।
मीडिया का काम सत्ता को यह बताना नहीं कि वह महान है।
उसका काम यह पूछना है कि—
“महान होने का प्रमाण कहाँ है?”
सत्ता को तालियाँ चाहिए।
मीडिया को सवाल चाहिए।
सत्ता को कथा चाहिए।
पत्रकारिता को तथ्य चाहिए।
सत्ता चाहती है कि जनता उसकी कहानी पर विश्वास करे।
पत्रकारिता का काम है—
कहानी के पीछे छिपी वास्तविकता को दिखाना।
वरना एक दिन पूरा राष्ट्र उस मुर्गे जैसा हो जाएगा जो लोमड़ी की तारीफ़ सुनकर आँखें बंद करके गाने लगा था।
फर्क सिर्फ़ इतना होगा कि इस बार लोमड़ी खेत के बाहर नहीं खड़ी होगी।
वह कैमरे के पीछे बैठी होगी।
और स्क्रीन पर नीचे लाल पट्टी चल रही होगी—
“BREAKING: राष्ट्र सुरक्षित है। कृपया सवाल न पूछें।”
Chandra, D. 2026
References
Abrams, M. H. (Meyer Howard), 1912-2015. A Glossary of Literary Terms. Boston, MA: Thomson, Wadsworth, 2005.
Chaucer, Geoffrey. The Canterbury Tales. Translated by Nevill Coghill, Penguin Classics, 2003.
HITT, RALPH E. “Chauntecleer As Mock-Hero Of The ‘Nun’s Priest’s Tale.’” The Mississippi Quarterly, vol. 12, no. 2, 1959, pp. 75–85. JSTOR, http://www.jstor.org/stable/26473177. Accessed 22 Dec. 2023.
Shallers, A. Paul. “The ‘Nun’s Priest’s Tale’: An Ironic Exemplum.” ELH, vol. 42, no. 3, 1975, pp. 319–37. JSTOR, https://doi.org/10.2307/2872707. Accessed 22 Dec. 2023.