सीता का मौन, देह और प्रतिरोध: वर्जीनिया वूल्फ, सिल्विया प्लाथ, जूडिथ बटलर और महाश्वेता देवी के आईने में

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सीता का मौन, देह और प्रतिरोध

क्या सीता की पवित्रता सिद्ध थी?”
यह प्रश्न सदियों से पूछा जाता रहा है।

लेकिन एक feminist reading शायद इससे कहीं अधिक असहज प्रश्न पूछती है—

आख़िर सीता की पवित्रता को सिद्ध करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?”

यहीं से रामायण को केवल एक धार्मिक आख्यान, आदर्श दाम्पत्य की कथा या त्याग और पतिव्रता की कहानी के रूप में पढ़ने से आगे बढ़ने की सम्भावना पैदा होती है।

सीता की कथा को यदि आधुनिक feminist theory के प्रकाश में पढ़ें, तो वह केवल एक “आदर्श पत्नी” की कथा नहीं रह जाती। वह स्थान, देह, सामाजिक प्रतिष्ठा, नैतिकता, स्त्री की agency, psychological confinement और प्रतिरोध की कथा बन जाती है।

वर्जीनिया वूल्फ हमें पूछना सिखाती हैं कि स्त्री के पास अपना स्थान कितना है।
सिल्विया प्लाथ बताती हैं कि सामाजिक अपेक्षाएँ स्त्री के भीतर किस तरह मनोवैज्ञानिक दबाव बन सकती हैं।
जूडिथ बटलर समझाती हैं कि “स्त्रीत्व” कोई स्वाभाविक, स्थिर पहचान मात्र नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से दोहराए जाने वाले व्यवहारों से निर्मित भी होता है।
और महाश्वेता देवी हमें दिखाती हैं कि स्त्री की देह स्वयं सत्ता और प्रतिरोध का रणक्षेत्र बन सकती है।

इन चार दृष्टियों से देखी गई सीता न तो केवल “अबला” हैं और न ही आधुनिक अर्थों में कोई feminist activist।

वह इससे अधिक जटिल हैं।

वह एक ऐसी स्त्री हैं जो पितृसत्तात्मक व्यवस्था के भीतर जीती हैं, उसके नियमों से घायल होती हैं, कई बार उन्हीं नियमों को निभाती हैं, और अंततः उसी व्यवस्था के सामने अपने अस्तित्व की अंतिम सीमा स्वयं निर्धारित करती हैं।

सीता कोआदर्श पत्नीसे आगे पढ़ना

भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में सीता का स्थान असाधारण है।

वह मिथिला की राजकुमारी हैं।
राम की पत्नी हैं।
अयोध्या की रानी हैं।
लव-कुश की माँ हैं।

लेकिन इन सभी पहचानों के पीछे एक और पहचान लगातार उनका पीछा करती है—

क्या वह पवित्र हैं?”

यही प्रश्न उनकी पूरी कथा को एक विचित्र नैतिक निगरानी के घेरे में रख देता है।

लंका में रावण के बंदीगृह में रहने के बाद जब सीता राम के सामने आती हैं, तो उनके चरित्र पर प्रश्न उठता है। वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में अग्नि-परीक्षा का प्रसंग आता है। सीता अग्नि में प्रवेश करती हैं और अग्निदेव उनकी पवित्रता की पुष्टि करते हैं।

लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

अयोध्या लौटने के बाद भी लोकापवाद समाप्त नहीं होता। एक धोबी की टिप्पणी और प्रजा की संभावित धारणा के कारण गर्भवती सीता को वन में छोड़ दिया जाता है। वहाँ वे वाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश का पालन-पोषण करती हैं।

वर्षों बाद जब वे पुनः राजसभा के सामने आती हैं, तब उनसे फिर अपने चरित्र की पुष्टि करने की अपेक्षा की जाती है। इस बार सीता अग्नि में प्रवेश नहीं करतीं।

वह पृथ्वी को साक्षी बनाती हैं।

और पृथ्वी—जिसे भारतीय परम्परा में उनकी माता माना जाता है—उन्हें अपने भीतर समा लेती है।

यहीं सीता की कथा का सबसे शक्तिशाली प्रश्न जन्म लेता है:

क्या यह एक स्त्री की हार थी, या सार्वजनिक न्याय के उस तंत्र से उसका अंतिम इनकार, जो उसे बारबार अपने चरित्र का प्रमाण देने के लिए बाध्य कर रहा था?

वर्जीनिया वूल्फ: जब स्त्री के पास अपनाकमरानहीं होता

वर्जीनिया वूल्फ की प्रसिद्ध कृति A Room of One’s Own का केंद्रीय आग्रह यह है कि स्त्री की intellectual और creative स्वतंत्रता के लिए उसे केवल प्रतिभा नहीं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता और अपना निजी स्थान भी चाहिए।

वूल्फ लिखती हैं कि सदियों से स्त्रियों को इस तरह रखा गया कि वे पुरुष के अस्तित्व को ही बड़ा करके दिखाने वाले “दर्पण” की तरह काम करती रहीं।

सीता की कथा को इस दृष्टि से पढ़ना अत्यंत रोचक है।

सीता स्वयं राजकुमारी हैं। उनके पास जन्म से ही सामाजिक प्रतिष्ठा है। बाद में वे अयोध्या की रानी बनती हैं।

फिर भी क्या उनके पास वास्तव में अपना स्थान है?

उनका जीवन लगातार किसी और की भूमिका से परिभाषित होता है—

राम की पत्नी,
दशरथ की पुत्रवधू,
अयोध्या की रानी,
लव-कुश की माता।

उनकी व्यक्तिगत इच्छा, उनका अपना सार्वजनिक अस्तित्व और उनकी agency इन भूमिकाओं के पीछे दबती रहती है।

सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सीता को राजमहल मिलता है, लेकिन स्वायत्त स्थान नहीं।

अंततः वन ही वह जगह बनता है जहाँ वे राजसत्ता से बाहर अपना जीवन जीती हैं। वाल्मीकि आश्रम में वे अपने पुत्रों का पालन-पोषण करती हैं। यह कोई आधुनिक अर्थों में “स्वतंत्र जीवन” नहीं है, लेकिन यह राजकीय निगरानी से बाहर एक अलग अस्तित्व अवश्य है।

इसलिए वूल्फ के संदर्भ में सीता की समस्या को केवल “महल बनाम जंगल” के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

समस्या है—

स्त्री कहाँ रह सकती है, किस शर्त पर रह सकती है और अपने जीवन के अर्थ को स्वयं कितना निर्धारित कर सकती है?

सीता के पास महल था।

लेकिन क्या वह उनका था?

 सिल्विया प्लाथ: “आदर्श स्त्रीबनने की मनोवैज्ञानिक कीमत

सिल्विया प्लाथ की The Bell Jar आधुनिक स्त्री के भीतर चलने वाले उस संघर्ष को सामने लाती है जिसमें समाज उसके लिए एक निश्चित जीवन-रूप निर्धारित करता है, जबकि उसके भीतर संभावनाओं और इच्छाओं की अनेक दिशाएँ मौजूद होती हैं।

यहाँ सीता की तुलना सावधानी से करनी होगी।

सीता और प्लाथ की Esther Greenwood एक जैसी स्त्रियाँ नहीं हैं। उनके सामाजिक संसार, ऐतिहासिक परिस्थितियाँ और अनुभव पूरी तरह अलग हैं।

लेकिन एक संरचनात्मक समानता दिखाई देती है—

जब समाज स्त्री के लिए केवल एक स्वीकार्य पहचान निर्धारित कर देता है, तो उस पहचान के बाहर जाना कितना कठिन हो जाता है?

सीता से अपेक्षा की जाती है कि वे एक साथ—

आदर्श पत्नी हों,
पतिव्रता हों,
त्यागमयी हों,
आदर्श रानी हों,
आदर्श बहू हों,
माँ हों,
और हर परिस्थिति में धैर्य धारण करें।

उनसे केवल अच्छा व्यवहार करने की अपेक्षा नहीं है।

उनसे नैतिक आदर्श का प्रदर्शन करने की अपेक्षा है।

यही फर्क महत्वपूर्ण है।

एक स्त्री का चरित्र उसका निजी विषय न रहकर सार्वजनिक प्रतिष्ठा का विषय बन जाता है।

सीता की देह, उनकी यौनिकता, उनकी गर्भावस्था और उनकी वैवाहिक निष्ठा—सब कुछ सामाजिक नैतिकता की भाषा में पढ़ा जाता है।

यहाँ प्रश्न केवल यह नहीं है कि सीता अग्नि-परीक्षा क्यों देती हैं।

प्रश्न यह है कि—

किस सामाजिक व्यवस्था में एक स्त्री को अपने चरित्र की सच्चाई सिद्ध करने के लिए अपने शरीर को प्रमाण बनाना पड़ता है?

और शायद यहीं “आदर्श स्त्री” की अवधारणा अपनी सबसे कठोर शक्ल में सामने आती है।

जिस स्त्री को जितना आदर्श बनाया जाता है, उससे उतने ही अधिक त्याग की अपेक्षा की जा सकती है।

उसकी सहनशीलता उसकी शक्ति भी बनती है और उसके नियंत्रण का साधन भी।

इसलिए सीता की सहनशीलता का रोमानीकरण खतरनाक हो सकता है।

यदि हम हर suffering को “महान स्त्रीत्व” कहकर महिमामंडित कर दें, तो हम उस व्यवस्था पर प्रश्न उठाना बंद कर देते हैं जिसने वह suffering पैदा की।

 जूडिथ बटलर: सीता औरआदर्श स्त्रीका प्रदर्शन

जूडिथ बटलर का gender performativity का सिद्धान्त यहाँ एक अत्यंत शक्तिशाली lens उपलब्ध कराता है।

बटलर के अनुसार gender केवल हमारे भीतर मौजूद कोई स्थिर essence नहीं है जिसे हम बाहर व्यक्त करते हैं। Gender सामाजिक norms के भीतर बारबार दोहराए जाने वाले व्यवहारों और performances के माध्यम से निर्मित और स्थिर दिखाई देता है।

अब सीता को देखें।

उनसे बार-बार कुछ विशेष व्यवहारों की अपेक्षा की जाती है—

पतिव्रता होना।
आज्ञाकारी होना।
त्याग करना।
सहन करना।
मर्यादा बनाए रखना।
पति के साथ वन जाना।
अपनी पवित्रता सिद्ध करना।
सार्वजनिक संदेह के सामने मौन गरिमा बनाए रखना।

इन व्यवहारों की निरंतर पुनरावृत्ति “आदर्श स्त्री” की छवि निर्मित करती है।

दिलचस्प बात यह है कि सीता का वन जाना भी इसी व्यवस्था में पढ़ा जा सकता है।

राम को वनवास मिला।

लेकिन सीता ने स्वयं उनके साथ जाने का निर्णय लिया।

यहाँ agency और patriarchy का सम्बन्ध जटिल हो जाता है।

क्या यह उनकी स्वतंत्र इच्छा थी?

हाँ, कथा में वे स्वयं वन जाने पर दृढ़ होती हैं।

लेकिन क्या उनकी इच्छा भी उस समय उपलब्ध “आदर्श पत्नी” की सांस्कृतिक भाषा से पूरी तरह अलग थी?

यह प्रश्न खुला रहना चाहिए।

यही feminist reading की खूबसूरती है—यह हमेशा आसान उत्तर नहीं देती।

अग्निपरीक्षा: performance की सबसे कठोर अवस्था

सीता की अग्नि-परीक्षा को Butler के lens से देखें तो यह केवल पवित्रता की परीक्षा नहीं है।

यह एक public performance of purity है।

सीता को अपनी आंतरिक सच्चाई का प्रमाण सार्वजनिक रूप से अपने शरीर के माध्यम से देना पड़ता है।

और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि एक बार प्रदर्शन करने के बाद भी सामाजिक संदेह समाप्त नहीं होता।

अयोध्या में लौटने के बाद भी लोकापवाद सामने आता है।

इससे एक भयावह संरचना दिखाई देती है—

पितृसत्ता स्त्री से केवलअच्छाहोने की अपेक्षा नहीं करती; वह उससे लगातारअच्छी होने का प्रमाणमाँग सकती है।

यही कारण है कि सीता का अंतिम निर्णय इतना महत्वपूर्ण हो जाता है।

जब उनसे फिर सार्वजनिक रूप से अपनी पवित्रता की पुष्टि करने की अपेक्षा की जाती है, तो वे अपने लिए पृथ्वी को साक्षी बनाती हैं।

और पृथ्वी में समा जाती हैं।

इसे एक तरह से gendered script से अंतिम withdrawal के रूप में पढ़ा जा सकता है।

वह कहती हुई प्रतीत होती हैं—

मेरे सत्य का अंतिम निर्णायक समाज नहीं है।

महाश्वेता देवी: जब स्त्री की देह ही प्रतिरोध बन जाती है

महाश्वेता देवी की कहानी द्रौपदी इस विमर्श में एक अलग और बेहद महत्वपूर्ण भारतीय तथा postcolonial dimension जोड़ती है।

कहानी की नायिका डोपदी मेझेन एक आदिवासी महिला और राजनीतिक विद्रोही है। राज्य की सैन्य मशीनरी उसे पकड़ती है और उसके साथ बलात्कार किया जाता है।

लेकिन कहानी का सबसे भयावह और सबसे शक्तिशाली क्षण बलात्कार स्वयं नहीं है।

वह क्षण है जब अगली सुबह डोपदी को कपड़े पहनकर सेनानायक के सामने आने के लिए कहा जाता है।

डोपदी कपड़े पहनने से इंकार करती है।

वह नग्न अवस्था में उसके सामने खड़ी होती है।

जिस देह को राज्य ने humiliation और punishment का माध्यम बनाया था, वही देह उसके प्रतिरोध का माध्यम बन जाती है।

यहाँ महाश्वेता देवी हमें एक असाधारण feminist insight देती हैं—

सत्ता स्त्री के शरीर पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती है; लेकिन वही शरीर कभीकभी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का सबसे तीखा माध्यम बन सकता है।

अब सीता को इस lens से देखें।

सीता की स्थिति डोपदी से बिल्कुल अलग है।

डोपदी आधुनिक राज्य, सैन्य हिंसा, वर्ग, जाति और आदिवासी राजनीतिक संघर्ष के बीच स्थित हैं। सीता एक प्राचीन महाकाव्य की राजपरिवार से जुड़ी स्त्री हैं।

फिर भी दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण conceptual connection बनता है—

स्त्री की देह को सामाजिक और राजनीतिक अर्थों से मुक्त नहीं छोड़ा जाता।

सीता की sexuality सार्वजनिक चिंता बनती है।

उनकी chastity राजकीय प्रतिष्ठा से जुड़ती है।

उनकी गर्भावस्था legitimacy के प्रश्नों से जुड़ती है।

उनकी motherhood राजवंश के भविष्य से जुड़ती है।

अर्थात् उनकी देह केवल उनकी देह नहीं रह जाती।

वह political body बन जाती है।

सीता की देह पर किसका अधिकार है?

यहीं चारों feminist perspectives एक बिंदु पर आकर मिलते हैं।

सीता की देह—

कभी पत्नी की देह है,
कभी रानी की देह है,
कभी माँ की देह है,
कभी वंश की वैधता की देह है,
कभी सार्वजनिक नैतिकता की देह है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—

क्या वह स्वयं की देह है?

अग्नि-परीक्षा में देह को प्रमाण बनाया जाता है।

वनवास में देह को राजकीय निर्णय का परिणाम भुगतना पड़ता है।

गर्भावस्था के दौरान भी उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा से अधिक राजकीय और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।

और अंत में वही देह पृथ्वी को सौंप दी जाती है।

इसलिए सीता का अंतिम पृथ्वी-प्रवेश केवल धार्मिक या चमत्कारिक घटना मानकर छोड़ देना उनकी कथा के एक गहरे feminist अर्थ को अनदेखा करना हो सकता है।

इसे एक ऐसी स्त्री की अंतिम सीमा के रूप में भी पढ़ा जा सकता है जो कहती है—

अब मेरे अस्तित्व का अर्थ कोई और तय नहीं करेगा।

अग्निपरीक्षा: सीता की परीक्षा या समाज की?

शायद रामायण के सबसे असहज प्रश्नों में से एक यही है।

यदि सीता ने अग्नि-परीक्षा दी, तो परीक्षा किसकी थी?

सीता की?

या उस समाज की नैतिकता की?

चारों feminist thinkers हमें इस प्रश्न को चार दिशाओं से देखने में मदद करते हैं।

वूल्फ पूछती हैं:

सीता के पास अपना स्वतंत्र स्थान कहाँ था?

प्लाथ पूछती हैं:

एक आदर्श स्त्री बनने की निरंतर अपेक्षा उसके भीतर क्या दबाव पैदा करती है?

बटलर पूछती हैं:

किस तरह बारबार दोहराए गए gendered व्यवहारआदर्श स्त्रीकी छवि को प्राकृतिक बना देते हैं?

महाश्वेता देवी पूछती हैं:

जब स्त्री की देह सत्ता का क्षेत्र बन जाती है, तो क्या वही देह प्रतिरोध का माध्यम भी बन सकती है?

इन चार प्रश्नों के बाद “क्या सीता पवित्र थीं?” जैसा प्रश्न अचानक बहुत छोटा लगने लगता है।

क्योंकि वह प्रश्न सीता को कटघरे में खड़ा करता है।

जबकि दूसरा प्रश्न—

सीता को कटघरे में खड़ा करने वाला समाज किस नैतिकता पर खड़ा था?”

पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर देता है।

सीता: धर्म और आत्मस्वायत्तता के बीच

सीता की सबसे बड़ी जटिलता शायद यही है कि उन्हें आधुनिक अर्थों में “rebellious woman” बनाकर पढ़ना भी उतना ही गलत होगा जितना उन्हें केवल “obedient wife” मान लेना।

वह धर्म की भाषा में जीती हैं।

वह अपने समय और सामाजिक व्यवस्था से पूरी तरह बाहर खड़ी होकर उसे चुनौती नहीं देतीं।

उनकी agency उसी संसार के भीतर आकार लेती है।

यही बात उन्हें अधिक मानवीय और अधिक जटिल बनाती है।

सीता की पहचान अनेक भूमिकाओं से बनी है—

मिथिला की पुत्री।
राम की पत्नी।
अयोध्या की रानी।
लवकुश की माँ।

हर भूमिका उनके लिए प्रेम और संबंध लेकर आती है।

लेकिन हर भूमिका उनके ऊपर एक obligation भी रखती है।

पत्नी होने का अर्थ निष्ठा।

रानी होने का अर्थ मर्यादा।

माँ होने का अर्थ जिम्मेदारी।

राजपरिवार का हिस्सा होने का अर्थ सार्वजनिक नैतिकता।

और स्त्री होने का अर्थ—अंतहीन निगरानी।

यही वह बिंदु है जहाँ patriarchy की सबसे सूक्ष्म शक्ति दिखाई देती है।

पितृसत्ता केवल स्त्री को दंडित नहीं करती; वह उसकी खूबियों को ही नियंत्रण के उपकरण में बदल देती है।

सीता की fidelity उनका दायित्व बन जाती है।

उनका patience उनकी अपेक्षित विशेषता बन जाता है।

उनकी purity सार्वजनिक संपत्ति बन जाती है।

उनका motherhood राजवंश की जिम्मेदारी बन जाता है।

और उनका sacrifice सामान्य बना दिया जाता है।

सहना और प्रतिरोध: क्या दोनों विरोधी हैं?

सीता को अक्सर “सहनशीलता” की प्रतिमूर्ति कहा जाता है।

लेकिन feminist reading हमें यह पूछने की अनुमति देती है—

क्या सहना हमेशा submission होता है?

और दूसरी ओर—

क्या प्रतिरोध हमेशा ऊँची आवाज़ में किया जाता है?

महाश्वेता देवी की डोपदी का प्रतिरोध विस्फोटक है।

सीता का प्रतिरोध अपेक्षाकृत शांत है।

डोपदी सत्ता की आँखों में आँख डालकर खड़ी होती है।

सीता अंततः उस सार्वजनिक व्यवस्था से स्वयं को वापस ले लेती हैं जो बार-बार उनके सत्य की जाँच करना चाहती है।

दोनों की राजनीति अलग है।

लेकिन दोनों हमें बताते हैं कि स्त्री की agency का केवल एक रूप नहीं होता।

कभी agency बोलने में है।

कभी मना करने में।

कभी घर छोड़ने में।

कभी घर में रहने में।

कभी अपनी देह को नियंत्रित करने में।

और कभी यह तय करने में कि अब किसी को कुछ सिद्ध नहीं करना है।

सीता की अंतिम यात्रा: हार या अंतिम स्वायत्तता?

उत्तरकाण्ड की परम्परा में जब सीता से पुनः अपनी पवित्रता की पुष्टि करने की अपेक्षा की जाती है, तब उनका उत्तर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वह अग्नि-परीक्षा दोहराने के बजाय पृथ्वी को साक्षी बनाती हैं।

यदि उन्होंने चाहा होता, तो इस प्रसंग को एक और “proof of purity” में बदला जा सकता था।

लेकिन कथा दूसरी दिशा लेती है।

पृथ्वी उन्हें अपने भीतर ले लेती है।

यहाँ feminist interpretation एक असाधारण सम्भावना खोलती है।

सीता स्वयं को उस सार्वजनिक मंच से हटा लेती हैं जहाँ उनके अस्तित्व का मूल्यांकन लगातार दूसरों द्वारा किया जा रहा था।

यह withdrawal पलायन भी पढ़ा जा सकता है।

यह त्रासदी भी है।

लेकिन इसे resistance भी पढ़ा जा सकता है।

एक ऐसी resistance जो कहती है—

मेरी गरिमा का अंतिम प्रमाण किसी सभा, राजा या समाज के हाथ में नहीं है।

सीता अपने सत्य को समाज की स्वीकृति पर निर्भर नहीं रहने देतीं।

उनका अंतिम निर्णय इस अर्थ में “मौन” होते हुए भी बेहद शक्तिशाली है।

सीता को आधुनिक feminist बनाना भी एक गलती होगी

यहाँ एक सावधानी आवश्यक है।

हमें सीता को आज की भाषा में सीधे “feminist icon” घोषित कर देने से बचना चाहिए।

क्योंकि ऐसा करना इतिहास और साहित्य दोनों के साथ अन्याय कर सकता है।

सीता इक्कीसवीं सदी की feminist theory नहीं जानती थीं।

उनका सामाजिक संसार आधुनिक लोकतंत्र, individual rights या contemporary gender politics से बिल्कुल अलग था।

इसलिए बेहतर प्रश्न यह नहीं है—

क्या सीता feminist थीं?”

बेहतर प्रश्न है—

सीता की कथा हमें patriarchy के बारे में क्या देखने देती है?”

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

हम सीता पर आधुनिक feminism आरोपित नहीं कर रहे।

हम feminism की मदद से सीता की कथा में मौजूद agency, surveillance, gender norms, social control और resistance को अधिक स्पष्टता से देख रहे हैं।

चार स्त्रियाँ, चार प्रतिरोध

वूल्फ, प्लाथ, बटलर और महाश्वेता देवी—चारों स्त्री की स्वतंत्रता को अलग-अलग धरातलों पर समझने में हमारी मदद करती हैं।

वूल्फ हमें बताती हैं कि स्वतंत्रता के लिए स्त्री को अपना स्थान चाहिए।

प्लाथ हमें बताती हैं कि imposed femininity केवल बाहर से नियंत्रण नहीं करती; वह भीतर psychological pressure भी बन सकती है।

बटलर हमें दिखाती हैं कि “आदर्श स्त्री” की पहचान बार-बार दोहराए गए gender performances से निर्मित होती है।

महाश्वेता देवी हमें याद दिलाती हैं कि स्त्री की देह स्वयं सत्ता और प्रतिरोध का battlefield बन सकती है।

और इन चारों को सीता के साथ पढ़ने पर एक नया चित्र उभरता है।

सीता केवल वह स्त्री नहीं हैं जिसने अग्नि में प्रवेश किया।

वह वह स्त्री भी हैं—

जिसके पास अपना स्वतंत्र स्थान सीमित था,
जिसके शरीर को सार्वजनिक प्रमाण बनाया गया,
जिसके स्त्रीत्व से लगातार performances की अपेक्षा की गई,
जिसकी motherhood को राजकीय अर्थ दिया गया,
और जिसने अंततः अपने अस्तित्व का अंतिम निर्णय स्वयं किया।

सीता से आगे: आज हमें क्या पूछना चाहिए?

सीता की कथा का आधुनिक महत्व शायद इसी में है कि वह हमें आज भी असुविधाजनक प्रश्न पूछने पर मजबूर करती है।

आज भी समाज स्त्री से पूछता है—

वह कहाँ थी?
किसके साथ थी?
उसने क्या पहना था?
उसने क्या किया था?
उसका चरित्र कैसा है?
वह कैसी पत्नी है?
कैसी माँ है?

अर्थात् सदियाँ बदल जाती हैं, लेकिन स्त्री के चरित्र की सार्वजनिक निगरानी के रूप बदलते रहते हैं।

इसीलिए सीता को केवल “आदर्श नारी” के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है।

हमें यह भी देखना होगा कि आदर्श नारी की परिभाषा किसने बनाई, उसके नियम किसने निर्धारित किए और उन नियमों का भार किसके शरीर और जीवन पर पड़ा।

निष्कर्ष: सीता का सबसे बड़ा प्रश्न

सीता की कहानी हमें यह नहीं सिखाती कि स्त्री को कितना सहना चाहिए।

शायद वह हमें इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण बात सिखाती है—

किसी स्त्री की सहनशीलता को उसकी अनिवार्य नियति मत बना दीजिए।

वूल्फ के आईने में सीता हमें बताती हैं कि प्रतिष्ठा और स्वतंत्र स्थान एक ही चीज़ नहीं हैं।

प्लाथ के आईने में वह दिखाती हैं कि आदर्श स्त्री बनने की सामाजिक अपेक्षा कितनी भारी हो सकती है।

बटलर के आईने में वह दिखाई देती हैं एक ऐसे gendered script के भीतर, जिसमें पत्नी, रानी, माँ और पतिव्रता की भूमिकाएँ बार-बार enact करनी पड़ती हैं।

और महाश्वेता देवी के आईने में उनकी देह दिखाई देती है—एक ऐसी देह जिस पर समाज नैतिकता लिखना चाहता है, लेकिन जो अंततः अपने अस्तित्व की अंतिम सीमा स्वयं निर्धारित करती है।

इसलिए सीता की कथा को केवल यह कहकर समाप्त करना कि वह आदर्श पत्नी थीं, उनकी जटिलता को छोटा कर देना है।

सीता की शक्ति शायद केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने कितना सहा।

उनकी शक्ति इस बात में भी है कि एक बिंदु पर उन्होंने तय किया कि अब उन्हें स्वयं को सिद्ध नहीं करना है।

और शायद यही अग्नि-परीक्षा का सबसे radical पुनर्पाठ है।

अग्नि में प्रवेश करने वाली सीता को केवल पवित्रता की प्रतीक मानना आसान है।

लेकिन उस सीता को देखना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है जो अंततः कहती हुई प्रतीत होती हैं—

मेरे सत्य का निर्णय अब कोई और नहीं करेगा।

यहीं सीता “आदर्श स्त्री” से आगे बढ़कर एक प्रश्न बन जाती हैं।

एक ऐसा प्रश्न जो आज भी हमारे सामने खड़ा है—

जब किसी समाज को बारबार किसी स्त्री से उसकी गरिमा, उसकी निष्ठा और उसके चरित्र का प्रमाण चाहिए, तो वास्तव में परीक्षा किसकी हो रही हैउस स्त्री की, या उस समाज की?

Author: Chandra, D.

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