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जब बेटियां गाली देती हैं: क्यों पितृसत्ता महिलाओं के गुस्से को ‘संस्कृति आघात’ कहती है

जब बेटियां गाली देती हैं: क्यों पितृसत्ता महिलाओं के गुस्से को ‘संस्कृति आघात’ कहती है
  • PublishedSeptember 5, 2026

जब बेटियां गाली देती हैं

एक बेचैन करने वाला सवाल युवा महिलाओं की भाषा के नीचे छिपा है—क्या हम सच में शब्दों से नाराज़ हैं? या सिर्फ इसलिए पाखंड करते हैं कि जब वही अपशब्द युवा महिलाओं के मुँह से निकलते हैं तो उनका वजन अचानक बहुत बढ़ जाता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जब जंतर मंतर पर कुछ युवा प्रदर्शनकारियों ने गालियाँ दीं तो उन्होंने ‘संस्कृति आघात’ महसूस किया। सवाल यह है—क्या यह आघात सिर्फ युवा महिलाओं की भाषाई अशिष्टता से पैदा होता है? क्या रोज़ाना प्राइम-टाइम शो में गालियाँ, या खुद प्रधानमंत्री के कई भाषणों में प्रयुक्त तीखी भाषा, या संसद में उनके दल के सदस्यों द्वारा इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा कभी ‘संस्कृति आघात’ नहीं बनती? यह चुनिंदा नैतिकता का मामला तो नहीं?

नोएडा निवासी रुचिका सिंह का मामला इस दोहरे मापदंड को बेनकाब करता है। जुलाई 2026 में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान जंतर मंतर पर उन्होंने प्रधानमंत्री के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 352(1), 353(1) और 356(1) के तहत जीरो एफआईआर दर्ज की—जो शांति भंग, सार्वजनिक उपद्रव और मानहानि से संबंधित हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि अपशब्दों का इस्तेमाल अपने-आप में आपराधिक नहीं बनाया गया है। रुचिका महज 15 साल की नाबालिग लड़की हैं। पुलिस ने न सिर्फ एफआईआर दर्ज की बल्कि आईटी सेल के सदस्यों को धमकाने, माफी वीडियो बनवाने और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की सुविधा भी दी।

इन्हीं घटनाओं और कई अन्य वीडियो का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री कहते हैं कि उन्हें संस्कृति आघात लगा। लेकिन जब उनके समर्थक, आईटी सेल या वे लोग जिन्हें वे एक्स पर फॉलो करते हैं, विरोधियों के खिलाफ गाली-गलौज और धमकियाँ देते हैं, तब क्यों कोई आघात नहीं लगता? संसद में अपने दल के सदस्यों की अभद्र भाषा पर क्यों चुप्पी?

एक देर रात के सेल्फी वीडियो में प्रधानमंत्री कहते हैं कि बच्चे गुमराह हैं और वे उन्हें माफ करने को तैयार हैं। वे खुद को भारत के सांस्कृतिक संरक्षक के रूप में पेश करते हैं। लेकिन यह रवैया असल में किशोर महिलाओं को ‘गुमराह बच्चे’ बनाकर उनका शिशुकरण (infantilisation) करता है। आलोचना का जवाब राजनीतिक स्तर पर देने की बजाय वे पिता की भूमिका अपनाते हैं—‘अच्छी बेटी ऐसे नहीं बोलती।’

मानवविज्ञानी कलर्वो ओबर्ग के अनुसार, सांस्कृतिक आघात तब होता है जब कोई व्यवहार परिचित सांस्कृतिक अपेक्षाओं से टकराता है। लेकिन जब वही ‘अपरिचित’ व्यवहार उसी संस्कृति से, खासकर अपनी ही बेटियों से आता है, तो आघात और गहरा हो जाता है। असली सदमा अपशब्द नहीं है—वे तो समाज, संस्कृति और राजनीति का हिस्सा रहे हैं—बल्कि यह है कि वे पुरुषों के विशेषाधिकार वाले क्षेत्र से निकलकर महिला वक्ता के मुँह से आ रहे हैं।

पितृसत्तात्मक दृष्टि से यह और भी रोचक है। पुरुष आक्रामक हो सकता है, शक्तिशाली दिखता है; महिला अगर आवाज़ उठाए तो ‘हिस्टीरिकल’ या ‘काबू से बाहर’ लगती है। पुरुष सत्ता का सामना करे तो विद्रोही; महिला करे तो अनुशासनहीन। पियरे बॉर्दियो का ‘हैबिटस’ इस बात को समझाता है—सामाजिक मानदंड शरीर और स्वभाव में इतने गहराई से बस जाते हैं कि वे ‘स्वाभाविक’ लगने लगते हैं। सीता की अग्नि-परीक्षा वाली नैतिकता अभी भी सामाजिक मानदंडों में समाई हुई है, जबकि द्रौपदी जैसी सवाल करने वाली स्त्री की छवि असुविधाजनक बनी रहती है। राम ने राजधर्म निभाने के लिए गर्भवती पत्नी का त्याग किया—यह ‘सामान्य’ माना जाता है।

जूडिथ बटलर का जेंडर परफॉर्मेटिविटी सिद्धांत और स्पष्ट करता है। स्त्रीत्व लगातार दोहराए जाने वाले कृत्यों और भाषण से रचा जाता है। ‘अच्छी औरत’ को संयमित, विनम्र, गैर-धमकीभरे और मापे हुए शब्दों में बोलना होता है—यह लिंगबद्ध भाषाई स्क्रिप्ट है। जब युवा महिला इस स्क्रिप्ट को ठुकराती है तो एफआईआर, धमकी या गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता है।

मिशेल फूको की अनुशासनात्मक शक्ति का विचार बताता है कि सत्ता सिर्फ सेंसरशिप से नहीं, बल्कि भाषण के वर्गीकरण से भी काम करती है। कुछ भाषण ‘सम्मानजनक’ होते हैं, कुछ ‘भावुक’ या ‘अशिष्ट’। जब प्रधानमंत्री स्वयं विरोधियों पर तीखे हमले करते हैं तो वे ‘शक्तिशाली हमला’ कहलाते हैं; लेकिन युवा महिलाओं की भाषा को ‘गुमराह बच्चों’ की गलती बताकर माफ करने का नाटक किया जाता है—ताकि सही व्यवहार करने वाला विषय तैयार हो सके।

गेर्ट हॉफस्टेड के सांस्कृतिक आयामों के अनुसार भारत मुख्यतः सामूहिक (collectivist) समाज है। यहाँ पहचान व्यक्तिगत स्वायत्तता से ज्यादा रिश्तों—माता-पिता, समुदाय, लिंग—से जुड़ी होती है। इसलिए प्रतिक्रिया बनती है—‘हमारी बेटी ऐसे कैसे बोल सकती है?’ शुद्धता और अशुद्धता का बोझ मुख्य रूप से महिलाओं पर डाला जाता है। पुरुष की गाली ‘सामान्य’ हो सकती है; महिला की गाली पूरी संस्कृति के लिए शर्मिंदगी बन जाती है।

फिर भी भारत की जेन-जेड सामूहिक मानदंडों को छोड़ रही है। यह बदलाव सिर्फ भाषा का नहीं, पितृसत्ता को चुनौती देने का भी है। अपशब्द अपने-आप में भाषा नहीं हैं—वे किसी भी भाषा को तेज करते हैं, विरोध की अभिव्यक्ति को धार देते हैं। जब बेटियाँ वही भाषा बोलती हैं जो अब तक बेटों का विशेषाधिकार माना जाता था, तो ‘संस्कृति आघात’ असल में उस पुरानी व्यवस्था का आघात है जो महिलाओं को स्वायत्त व्यक्ति के बजाय परिवार और राष्ट्र की नैतिकता की रखवाली करने वाली भूमिका में कैद रखना चाहती है।

यह आघात शब्दों का नहीं, सत्ता के खोते हुए एकाधिकार का है।

D.Chandra, 2026

Citations

Deccan Herlad, 2026. ‘Abuses never solve anything’: PM Modi’s new video message: https://www.deccanherald.com/india/abuses-never-solve-anything-pm-modis-new-video-message-4095094

Ibrahim, S.M. 2020. Individualism-collectivism score for India has me baffled…: PennState: https://sites.psu.edu/global/2020/11/02/individualism-collectivism-score-for-india-has-me-baffled/

Mamnani, H. 2026. The selective morality of online outrage, Frontline: https://frontline.thehindu.com/politics/ruchika-singh-bulli-bai/article71309148.ece

Pandey, G. 2026. The question dominating Indian politics: Is it worse when women swear?, BBC: https://www.bbc.com/news/articles/cy0zn6gy7zjo

Chishti, S. 2026. Neem ka Patta Kadwa Hai…Offended by B*, C*, M* and F* Words?, Wire: https://thewire.in/politics/neem-ka-patta-kadwa-haioffended-by-b-c-m-and-f-words

O’Neill, J., 1986. The disciplinary society: from Weber to Foucault. British Journal of Sociology, pp.42-60.

Sarangi, A., 2009. Languages as women: The feminisation of linguistic discourses in colonial North India. Gender & History21(2), pp.287-304.

Written By
SChandraLiterature

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