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प्राइमटाइम का चांटेक्लीर: मोदी-भक्ति और गोदी मीडिया का महाकाव्यात्मक हास्य

प्राइमटाइम का चांटेक्लीर: मोदी-भक्ति और गोदी मीडिया का महाकाव्यात्मक हास्य
  • PublishedAugust 9, 2026

कल्पना कीजिए—दिल्ली का कोई टीवी न्यूज़रूम है। कैमरे लाल हैं। स्क्रीन पर तिरंगा लहरा रहा है। बैकग्राउंड में तबला, शंख और किसी महाकाव्य के क्लाइमेक्स जैसा संगीत बज रहा है। एंकर की आवाज़ में वह कंपन है, जो सामान्यतः युद्ध की घोषणा, चंद्रयान की लैंडिंग या पृथ्वी के अंत के लिए बचाकर रखा जाता है।

और फिर घोषणा होती है—

प्रधानमंत्री ने आज एक पुल का उद्घाटन किया है।

पुल।

सिर्फ़ पुल।

लेकिन टेलीविज़न की भाषा में वह अब पुल नहीं रहा। वह नए भारत की नियति और सभ्यता के पुनर्जागरण के बीच बना ऐतिहासिक सेतु है।

यहीं से हमें चौसर की याद आती है।

जब मुर्गा बन गया महाकाव्य का नायक

Geoffrey Chaucer की The Nun’s Priest’s Tale में एक मुर्गा है—Chauntecleer। सुंदर है, अकड़ू है, अपनी आवाज़ पर मुग्ध है और सपने भी ऐसे देखता है जैसे देवताओं ने निजी तौर पर उसे भविष्यवाणी का अधिकार दे रखा हो।

असलियत?

वह एक मुर्गा है।

लेकिन चौसर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

वह उसकी बाँग को ऐसे सजाता है जैसे वह ब्रह्मांड की संगीत-व्यवस्था का कोई दिव्य स्वर हो। उसके सपने में लोमड़ी आती है तो मामला अचानक दर्शन, भाग्य, नियति और भविष्यवाणी का हो जाता है। और जब लोमड़ी उसकी तारीफ़ करती है—उसकी आवाज़, वंश और व्यक्तित्व की—तो हमारा वीर मुर्गा गर्दन तान देता है, आँखें मूँद लेता है और प्रशंसा के जाल में फँस जाता है।

चौसर का हास्य इसी जगह पैदा होता है।

घटना छोटी है, भाषा बहुत बड़ी।

एक मुर्गा है, लेकिन वर्णन ऐसा जैसे कुरुक्षेत्र का युद्ध होने वाला हो।

और यहीं, सदियों बाद, हमें आधुनिक भारतीय टीवी का एक अनपेक्षित साहित्यिक चचेरा भाई दिखाई देता है।

प्राइमटाइम का खेत

गोदी मीडिया की आलोचना करने वालों का आरोप रहा है कि कुछ टीवी और डिजिटल मंच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक राजनेता से आगे बढ़ाकर लगभग मिथकीय नायक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

राजनीति में यह अपने आप में कोई नई बात नहीं है। हर दौर अपने नेताओं के चारों ओर कथा बनाता है। नेता भी कथा चाहते हैं और दर्शक भी।

मगर असली मनोरंजन तब शुरू होता है जब कथा और घटना के बीच की दूरी बहुत ज़्यादा हो जाती है।

एक शिलान्यास होता है।

टीवी पर घोषणा होती है—

आज इतिहास ने करवट ली है।

एक भाषण होता है।

स्क्रीन पर शब्द उभरते हैं—

राष्ट्र की आत्मा को झकझोर देने वाला संबोधन!”

कोई सामान्य प्रशासनिक फैसला आता है।

एंकर की आवाज़ गहरी हो जाती है—

प्रधानमंत्री का यह मास्टरस्ट्रोक आने वाली पीढ़ियों की दिशा तय करेगा।

दर्शक सोच सकता है—भाई, यह योजना है या महाभारत का अठारहवाँ अध्याय?

यही mock-heroic हास्य है।

जहाँ साधारण घटना को इतनी ऊँची भाषा में पेश किया जाए कि भाषा स्वयं घटना से बड़ी हो जाए।

चौसर का लोमड़ी और प्राइमटाइम का एंकर

Chauntecleer की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी शक्ति नहीं, प्रशंसा की भूख है।

लोमड़ी यह समझती है।

वह कहती है—तुम्हारी आवाज़ अद्वितीय है, तुम्हारा वंश महान है, तुम्हारे जैसा कोई नहीं।

मुर्गा पिघल जाता है।

आँखें बंद।

गर्दन ऊपर।

और बस—फंदा तैयार।

आधुनिक राजनीतिक मीडिया में भी चापलूसी की यह कला कभी-कभी अपने चरम पर दिखाई देती है।

यहाँ लोमड़ी चार पैर वाली नहीं होती। उसके हाथ में माइक्रोफोन होता है।

वह पूछती है—

क्या प्रधानमंत्री ने आज फिर विपक्ष को चारों खाने चित कर दिया?”

दूसरा पैनलिस्ट कहता है—

बिल्कुल! बल्कि मैं तो कहूँगा कि यह विपक्ष के लिए राजनीतिक अस्तित्व का संकट है।

तीसरा कहता है—

देश ही नहीं, पूरी दुनिया आज इस नेतृत्व की ओर देख रही है।

और चौथा, शायद सबसे गंभीर चेहरे के साथ, कहता है—

इतिहास इस क्षण को याद रखेगा।

कैमरा कट।

ग्राफ़िक्स चमकते हैं।

संगीत बजता है।

और कहीं पीछे कोई साधारण नागरिक चुपचाप सोच रहा होता है—

पर हुआ क्या?”

यही सवाल इस पूरे नाटक का सबसे मज़ेदार पात्र है।

हर खबर में कुरुक्षेत्र क्यों?

राजनीतिक संचार का एक पुराना नियम है: कहानी तथ्य से अधिक याद रहती है।

इसलिए हर नेता अपने लिए कहानी बनाता है।

लेकिन जब हर घटना को महायुद्ध बना दिया जाए, हर विरोधी को खलनायक, हर समर्थक को योद्धा, हर निर्णय को मास्टरस्ट्रोक और हर असफलता को दीर्घकालिक रणनीति कहा जाने लगे, तब राजनीति धीरे-धीरे न्यूज़ से निकलकर पौराणिक धारावाहिक में प्रवेश कर जाती है।

फिर बजट सिर्फ़ बजट नहीं रहता।

वह “आर्थिक क्रांति” है।

सड़क सिर्फ़ सड़क नहीं रहती।

वह “विकास की नई धुरी” है।

भाषण सिर्फ़ भाषण नहीं रहता।

वह “राष्ट्र की आत्मा की पुकार” है।

और आलोचना?

वह नीति पर सवाल नहीं।

वह लगभग राष्ट्रद्रोह की पूर्व सूचना बन जाती है।

यही वह क्षण है जब हास्य जन्म लेता है।

क्योंकि दर्शक देख रहा है कि कहानी का पैमाना वास्तविकता से लगातार बड़ा होता जा रहा है।

कैमरा भी भक्त हो सकता है

इस कथा में सिर्फ़ शब्द काम नहीं करते।

कैमरा भी कहानी लिखता है।

धीमी गति में चलते नेता।

पीछे से आती रोशनी।

हवा में लहराता कुर्ता।

दूर तक फैली भीड़।

भव्य संगीत।

विशाल ग्राफ़िक्स।

और चेहरे पर ऐसा क्लोज़-अप जैसे अभी-अभी कोई दिव्य उद्घाटन होने वाला हो।

एक सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम को सिनेमाई दृश्य में बदलने की यह कला अपने आप में दिलचस्प है।

अगर चौसर के पास आधुनिक न्यूज़रूम होता, तो शायद वह Chauntecleer की बाँग के साथ तीन कैमरा एंगल लगवाता।

Wide shot: सूर्योदय।

Medium shot: मुर्गा गर्दन तान रहा है।

Close-up: आँखें बंद।

Breaking News:
चांटेक्लीर की ऐतिहासिक बाँग से खेत में नई सुबह!”

और नीचे टिकर चलता—

क्या यह बाँग लोमड़ी की राजनीति को बदल देगी?”

हँसी इसलिए आती है क्योंकि अनुपात टूट गया है

यहाँ असली बात सिर्फ़ मोदी या किसी मीडिया संगठन पर व्यंग्य करना नहीं है।

चौसर की खूबी इससे कहीं गहरी है।

वह हमें दिखाता है कि भाषा वास्तविकता को कैसे फुला सकती है।

जब छोटे विषय पर विशाल शब्द लगाए जाते हैं, तो विषय छोटा नहीं रहता—भाषा हास्यास्पद रूप से बड़ी हो जाती है।

एक मुर्गे को देवदूत बना दीजिए।

एक बाँग को ब्रह्मांडीय संगीत बना दीजिए।

एक लोमड़ी की चाल को दार्शनिक संकट बना दीजिए।

और पाठक हँसने लगता है।

आधुनिक प्राइमटाइम में भी यही विसंगति कभी-कभी दिखाई देती है।

किसी राजनीतिक उपलब्धि का मूल्यांकन करना एक बात है।

उसे हर बार ऐतिहासिक, अभूतपूर्व, युगांतरकारी, विश्वगुरुनिर्माणकारी घोषित करना दूसरी।

पहली पत्रकारिता हो सकती है।

दूसरी, जब लगातार दोहराई जाए, तो अनजाने में साहित्यिक व्यंग्य बन सकती है।

लेकिन खेत कहाँ गया?

चौसर का मज़ाक इसलिए काम करता है क्योंकि पाठक को पता रहता है कि खेत वास्तव में खेत ही है।

मुर्गा चाहे जितना महाकाव्यात्मक हो जाए, वह अंततः मुर्गा है।

और यही बात आधुनिक राजनीतिक कथा पर भी लागू होती है।

स्क्रीन पर राष्ट्र, इतिहास और सभ्यता की विराट भाषा चलती रहे—लेकिन वास्तविक जीवन में नागरिक महँगाई, रोज़गार, संस्थाओं की क्षमता, संघीय राजनीति, प्रशासन और रोज़मर्रा की समस्याओं से जूझता रहता है।

कैमरा जितना ऊपर जाता है, ज़मीन उतनी ही नीचे छूटती जाती है।

यही इस पूरे तमाशे का सबसे बड़ा व्यंग्य है।

स्क्रीन पर महाकाव्य।

नीचे टिकर।

और उसके नीचे असली दुनिया।

मोदी नायक हैं या चांटेक्लीर?

इस तुलना का अर्थ यह नहीं कि नरेंद्र मोदी कोई उपलब्धि हासिल नहीं करते, या उन्हें लोकप्रिय समर्थन प्राप्त नहीं है। न ही यह मान लेना चाहिए कि हर प्रशंसात्मक कवरेज अपने आप में प्रचार है।

राजनीतिक नेता लोकप्रिय होते हैं।

उनके इर्द-गिर्द मिथक बनते हैं।

जनता भी अक्सर जटिल नीतिगत बहस से अधिक एक स्पष्ट नायक की कहानी पसंद करती है।

समस्या तब शुरू होती है जब नायक की कहानी इतनी बड़ी हो जाए कि तथ्य उसके लिए केवल सहायक पात्र रह जाएँ।

चौसर का हास्य इसी सीमा पर खड़ा है।

Chauntecleer सचमुच शानदार मुर्गा है।

लेकिन वह महानायक नहीं है।

उसकी आवाज़ सचमुच अच्छी हो सकती है।

लेकिन उससे ब्रह्मांड की दिशा नहीं बदलती।

और अगर कोई लोमड़ी उसकी प्रशंसा करते-करते उसे यह विश्वास दिला दे कि वह खेत का सिकंदर है, तो पाठक जानता है कि अगला दृश्य शायद हास्यास्पद होने वाला है।

और फिर लोमड़ी आती है

इस कहानी में सबसे दिलचस्प पात्र शायद नेता भी नहीं है।

वह भाषा है।

वह भाषा जो कहती है—

यह सिर्फ़ फैसला नहीं है।

फिर बताती है कि यह इतिहास है।

यह सिर्फ़ भाषण नहीं है।

फिर बताती है कि यह युग की पुकार है।

यह सिर्फ़ चुनाव नहीं है।

फिर बताती है कि यह सभ्यता का संघर्ष है।

हर बार शब्द एक मंज़िल ऊपर चढ़ते हैं।

फिर एक और।

फिर एक और।

अंततः हम छत पर खड़े होकर नीचे देखते हैं और पाते हैं कि शुरुआत में मामला सिर्फ़ एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस का था।

यही Chauntecleer on Primetime का असली मज़ाक है।

जब हर खबर महाकाव्य बन जाए, तो महाकाव्य भी आखिरकार खबर जैसा लगने लगता है।

चौसर के खेत में मुर्गा अपनी बाँग पर गर्व करता था।

आज के स्टूडियो में भी एक चांटेक्लीर है।

फर्क सिर्फ़ इतना है कि उसके पास अब पंखों की जगह कैमरा है, बाँग की जगह प्राइमटाइम है और लोमड़ी अकेली नहीं है।

पूरा स्टूडियो उसकी आवाज़ को प्रतिध्वनि देने के लिए तैयार बैठा है।

और कैमरा?

कैमरा हमेशा सही कोण खोज लेता है।

इतना सही कि कुछ देर के लिए हमें यह भूलने में ही मज़ा आने लगता है कि—

चांटेक्लीर आखिरकार चांटेक्लीर ही है।

और खेत?

खेत अभी भी वहीं है।

Chandra, D. 2026

References

Abrams, M. H. (Meyer Howard), 1912-2015. A Glossary of Literary Terms. Boston, MA: Thomson, Wadsworth, 2005.

Chaucer, Geoffrey. The Canterbury Tales. Translated by Nevill Coghill, Penguin Classics, 2003.

HITT, RALPH E. “Chauntecleer As Mock-Hero Of The ‘Nun’s Priest’s Tale.’” The Mississippi Quarterly, vol. 12, no. 2, 1959, pp. 75–85. JSTORhttp://www.jstor.org/stable/26473177. Accessed 22 Dec. 2023.

Shallers, A. Paul. “The ‘Nun’s Priest’s Tale’: An Ironic Exemplum.” ELH, vol. 42, no. 3, 1975, pp. 319–37. JSTORhttps://doi.org/10.2307/2872707. Accessed 22 Dec. 2023.

Written By
SChandraLiterature

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