उर्दू की गिरती हुई दुनिया: अनिता देसाई के In Custody में भाषा, स्मृति और सांस्कृतिक क्षय
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती। वह किसी समाज की स्मृति, इतिहास, पहचान और सांस्कृतिक अनुभवों को अपने भीतर संजोए रखती है। जब कोई भाषा सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे पीछे हटने लगती है, तो उसके साथ केवल शब्दों का संसार नहीं मिटता; उसके साथ एक पूरी सांस्कृतिक चेतना, जीवन-शैली और स्मृति भी संकट में पड़ जाती है। अनिता देसाई का उपन्यास In Custody इसी गहरे सांस्कृतिक संकट को केंद्र में रखता है। उपन्यास में उर्दू का क्षय केवल एक भाषाई घटना नहीं, बल्कि एक ऐसे सांस्कृतिक संसार के विघटन का रूपक है जो आधुनिक भारत में अपनी जगह खोता जा रहा है।
देवन शर्मा की कहानी के माध्यम से देसाई उर्दू, हिंदी, आधुनिकता, स्मृति, सांस्कृतिक पहचान और सत्ता के बीच जटिल संबंधों को सामने लाती हैं। देवन हिंदी के अध्यापक हैं, लेकिन उनकी आत्मा उर्दू कविता में बसती है। यही विरोधाभास उन्हें उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण और त्रासद पात्र बनाता है। वे जिस भाषा से रोज़गार पाते हैं, वह हिंदी है; जिस भाषा से उनका भावनात्मक और साहित्यिक संसार निर्मित होता है, वह उर्दू है। इस तरह देवन स्वयं दो भाषाओं और दो सांस्कृतिक संसारों के बीच फँसे हुए मनुष्य का प्रतीक बन जाते हैं।
देवन: एक ऐसी भाषा का अनिच्छुक संरक्षक जो विलुप्ति की ओर है
देवन का जीवन आधुनिक भारत के उस मध्यवर्गीय यथार्थ को सामने लाता है जहाँ आर्थिक आवश्यकता और सांस्कृतिक आकांक्षा अक्सर एक-दूसरे के विरोध में खड़ी दिखाई देती हैं। हिंदी उन्हें जीवनयापन का साधन देती है, जबकि उर्दू उन्हें मानसिक और भावनात्मक संतोष देती है। वे हिंदी पढ़ाते हैं क्योंकि परिवार चलाने के लिए नौकरी आवश्यक है, लेकिन उनका वास्तविक साहित्यिक प्रेम उर्दू कविता के प्रति है।
यहीं से उपन्यास का केंद्रीय तनाव जन्म लेता है।
देवन उर्दू को बचाना चाहते हैं, लेकिन स्वयं उस भाषा की बदलती सामाजिक परिस्थितियों से जूझने में सक्षम नहीं हैं। बचपन की स्मृतियों में सुरक्षित उर्दू उन्हें सुंदर, परिष्कृत और महान दिखाई देती है। किंतु वर्तमान में वही उर्दू टूटती हुई संस्थाओं, आर्थिक संकट, बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं और सीमित पाठकीय संसार से घिरी हुई है।
जब उनके बचपन के मित्र मुराद उन्हें दिल्ली के प्रसिद्ध शायर नूर शाहजहानाबादी का साक्षात्कार करने के लिए प्रेरित करते हैं, तो देवन को लगता है कि उन्हें उस साहित्यिक संसार में लौटने का अवसर मिल गया है जिसकी वे वर्षों से कल्पना करते रहे हैं। लेकिन दिल्ली की यह यात्रा धीरे-धीरे साहित्यिक पुनर्जागरण की यात्रा के बजाय मोहभंग की यात्रा बन जाती है।
मिर्पोर: एक शहर नहीं, सांस्कृतिक क्षय का रूपक
उपन्यास का काल्पनिक शहर मिर्पोर केवल कथा की पृष्ठभूमि नहीं है। वह स्वयं उर्दू की स्थिति का प्रतीक बन जाता है।
मिर्पोर के इतिहास में एक मुस्लिम नवाब की स्मृति जुड़ी है, जिसने 1857 के विद्रोह के बाद दिल्ली से पलायन किया था और अपनी जान बचने की कृतज्ञता में एक मस्जिद का निर्माण कराया था। कभी संगमरमर और गुलाबी बलुआ पत्थर से बनी यह इमारत अब धूल, गंदगी और आधुनिक अव्यवस्था से घिरी हुई है। उसका क्षरण उस सांस्कृतिक परंपरा के क्षरण की याद दिलाता है, जिसका कभी वह प्रतिनिधित्व करती थी।
इसके विपरीत, मिर्पोर के हिंदू मंदिरों को एक ऐसी प्राचीनता से जोड़ा गया है जिसका कोई स्पष्ट आरंभ दिखाई नहीं देता। वे बार-बार टूटते, बनते और बदलते हैं, लेकिन उनका मूल रूप बना रहता है। इस विरोधाभास के कारण उपन्यास का भूगोल अपने भीतर एक गहरी वैचारिक संरचना ग्रहण कर लेता है।
यहीं देसाई की कथा एक असहज प्रश्न पैदा करती है: क्या भारतीय इतिहास में हिंदू परंपरा को ‘सनातन’ और मुस्लिम सांस्कृतिक उपस्थिति को अपेक्षाकृत बाद की ऐतिहासिक परत के रूप में देखने की प्रवृत्ति अनजाने में साहित्य में भी पुनरुत्पादित होती है?
यहाँ एडवर्ड सईद की ‘structures of attitude and reference’ की अवधारणा उपयोगी हो जाती है। साहित्य केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करता; वह कभी-कभी उन गहरे सांस्कृतिक दृष्टिकोणों को भी पुनरुत्पादित करता है जिनके माध्यम से किसी समुदाय, धर्म या इतिहास को देखा जाता है। मिर्पोर इसलिए एक भौगोलिक स्थान से आगे बढ़कर भाषा, धर्म और इतिहास की परस्पर उलझी हुई स्मृतियों का मानचित्र बन जाता है।
हिंदी और उर्दू: भाषा से आगे की राजनीति
In Custody में हिंदी और उर्दू का संबंध केवल दो भाषाओं का संबंध नहीं है। यह आधुनिक भारत में सत्ता, रोज़गार, पहचान और सांस्कृतिक अधिकारों के प्रश्न से जुड़ जाता है।
देवन हिंदी पढ़ाते हैं क्योंकि आधुनिक व्यवस्था में हिंदी उनके लिए अधिक व्यावहारिक और उपयोगी भाषा है। लेकिन उनका साहित्यिक मन उर्दू में अपना घर खोजता है। इसीलिए उनका व्यक्तित्व स्वयं भाषा-राजनीति का जीवंत रूपक बन जाता है।
देसाई हिंदी को खलनायक नहीं बनातीं। बल्कि वे उस सामाजिक और संस्थागत व्यवस्था की ओर संकेत करती हैं जिसमें एक भाषा सार्वजनिक और आर्थिक जीवन में अधिक शक्तिशाली होती जाती है, जबकि दूसरी भाषा धीरे-धीरे हाशिये पर चली जाती है।
मिर्पोर की सामुदायिक संरचना इस भाषाई विभाजन को और तीखा बनाती है। हिंदू और मुस्लिम इलाके अलग-अलग हैं और सामान्यतः एक-दूसरे को देखते हुए भी अपने-अपने संसारों में रहते हैं। होली और मुहर्रम के अवसर पर यह विभाजन तनाव और हिंसा में बदल जाता है।
इस प्रसंग में हिंदी और उर्दू अखबारों का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। समाचार-पत्र केवल घटनाओं की सूचना नहीं देते; वे तनाव को बढ़ाने वाली अलग-अलग भाषाई और सामुदायिक व्याख्याएँ भी निर्मित कर सकते हैं। इस प्रकार भाषा स्वयं राजनीतिक पहचान का माध्यम बन जाती है।
मुराद: पुनर्जीवन का भ्रम
मुराद देवन के जीवन में ऊर्जा और गति लेकर आता है। वह दिल्ली से आता है और देवन को उस दुनिया की ओर आकर्षित करता है जिससे वे वर्षों से दूर हो चुके हैं। लेकिन जल्दी ही स्पष्ट हो जाता है कि मुराद का साहित्यिक उत्साह उतना निष्कलंक नहीं है जितना देवन समझते हैं।
उसकी पत्रिका Awaz और नूर का साक्षात्कार देवन के लिए साहित्यिक आदर्शों की यात्रा है, लेकिन मुराद के लिए यह अवसरवाद और उपयोगिता का हिस्सा भी है। वह उर्दू की सांस्कृतिक स्मृति का उपयोग करता है, जबकि देवन उसी स्मृति में अपना अस्तित्व खोजते हैं।
यही दोनों मित्रों का सबसे बड़ा अंतर है।
मुराद सक्रिय है, लेकिन उसकी सक्रियता स्वार्थ और आधुनिक शहरी व्यावहारिकता से संचालित होती है। देवन निष्क्रिय हैं, लेकिन उनकी निष्क्रियता भावुकता और आदर्शवाद से जन्म लेती है। परिणामतः दोनों में से कोई भी उर्दू के लिए वास्तविक भविष्य का निर्माण नहीं कर पाता। देवन की दिल्ली-यात्रा इसलिए सांस्कृतिक पुनरुत्थान की यात्रा कम और अपरिवर्तनीय क्षय से सामना करने की यात्रा अधिक बन जाती है।
नूर शाहजहानाबादी: महान परंपरा का ढहता हुआ स्मारक
देवन के लिए नूर शाहजहानाबादी केवल एक शायर नहीं हैं। वे उर्दू के गौरवशाली अतीत के जीवित प्रतिनिधि हैं। देवन उनसे मिलकर मानो उस साहित्यिक स्वर्णयुग को छू लेना चाहते हैं जिसकी स्मृति उनके भीतर बची हुई है।
लेकिन नूर से मुलाकात उनकी कल्पना को तोड़ देती है।
जिस महान शायर की वे गरिमामय छवि लेकर दिल्ली पहुँचते हैं, उसके स्थान पर उन्हें एक वृद्ध, शराब में डूबा हुआ, आर्थिक और पारिवारिक अव्यवस्था से घिरा व्यक्ति मिलता है। नूर का शारीरिक और मानसिक पतन उर्दू की सांस्कृतिक स्थिति का रूपक बन जाता है। भाषा अभी जीवित है, लेकिन उसका गौरवशाली संसार बिखर चुका है।
यहाँ उपन्यास एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है: क्या किसी भाषा को केवल उसके महान अतीत की स्मृति से जीवित रखा जा सकता है?
देसाई का उत्तर लगभग नकारात्मक है। परंपरा को केवल पूजना पर्याप्त नहीं; उसे वर्तमान में जीवित रखना भी आवश्यक है।
इम्तियाज़ बेगम: उर्दू की वह आवाज़ जिसे सुनने से इनकार किया गया
उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर उपेक्षित परतों में से एक इम्तियाज़ बेगम का चरित्र है।
नूर की दूसरी पत्नी इम्तियाज़ बेगम स्वयं कविता लिखती हैं और देवन को चुनौती देती हैं। उनका प्रश्न केवल व्यक्तिगत अपमान का प्रश्न नहीं है। वे साहित्यिक सत्ता की उस पुरुषवादी संरचना को चुनौती देती हैं जिसमें पुरुष कवियों की प्रतिभा को स्वाभाविक रूप से मान्यता मिलती है, जबकि स्त्री की रचनात्मकता को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
उनकी आवाज़ में एक गहरा आत्मविश्वास है। उन्होंने औपचारिक शिक्षा के अभाव के बावजूद स्वयं को शिक्षित किया और अपनी साहित्यिक पहचान निर्मित की। वे देवन से पूछती हैं कि क्या उन्हें इस बात का भय था कि एक स्त्री की कविता उन पुरुष कवियों की कविता से आगे निकल सकती है जिन्हें वे आदर्श मानते हैं।
लेकिन देवन उनकी चुनौती स्वीकार नहीं करते।
वे उनकी पांडुलिपि को फाड़ देते हैं।
यह दृश्य केवल एक स्त्री की रचनात्मकता के दमन का दृश्य नहीं है। यह उर्दू की संभावित नई दिशाओं को नष्ट करने का भी प्रतीक है। यदि कोई भाषा केवल अपने पुराने, पुरुष-प्रधान और अभिजात साहित्यिक संसार को बचाने में लगी रहे और नए अनुभवों तथा नई आवाज़ों को स्वीकार न करे, तो उसका क्षय और तेज़ हो सकता है। इम्तियाज़ की पांडुलिपि का नष्ट होना इस सांस्कृतिक आत्म-विनाश का प्रतीक बन जाता है।
स्मृति बनाम आधुनिकता
In Custody का उर्दू संसार गहरी नॉस्टैल्जिया से निर्मित है। देवन, मुराद और नूर—तीनों किसी न किसी रूप में अतीत की ओर देखते हैं। उन्हें लगता है कि उर्दू का वास्तविक वैभव पीछे छूट चुका है।
लेकिन यही स्मृति उनकी सबसे बड़ी सीमा भी बन जाती है।
उर्दू उनके लिए दिल्ली, लखनऊ, मुगल दरबार, शायरी और बीते हुए सांस्कृतिक वैभव की भाषा है। वे यह कल्पना करने में कठिनाई महसूस करते हैं कि उर्दू एक नए सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में भी स्वयं को पुनर्निर्मित कर सकती है।
यहीं इंतज़ार हुसैन की उर्दू संबंधी धारणा देसाई के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण अंतर प्रस्तुत करती है। हुसैन के अनुसार उर्दू किसी एक क्षेत्र, शहर या संस्कृति की भाषा नहीं है; उसकी शक्ति उसकी मिश्रित प्रकृति और नए क्षेत्रों में स्वयं को ढाल लेने की क्षमता में निहित है।
इस दृष्टि से देखें तो उर्दू की शक्ति उसके अतीत में जितनी है, उसकी अनुकूलनशीलता में उससे कहीं अधिक है।
देसाई के उपन्यास में, हालांकि, उर्दू अक्सर एक जीवित भाषा की बजाय स्मृति की वस्तु बन जाती है—एक ऐसी परंपरा जिसे बचाने की इच्छा तो है, लेकिन जिसे नए जीवन से जोड़ने की कल्पना कम दिखाई देती है।
अंग्रेज़ी कथा से उर्दू की पुनर्प्राप्ति तक
In Custody की कहानी का एक दिलचस्प सांस्कृतिक विस्तार उसके फिल्म रूपांतरण में दिखाई देता है। उपन्यास के नौ वर्ष बाद इस पर फिल्म बनी और इसकी पटकथा को शाहरुख हुसैन ने अनिता देसाई के सहयोग से उर्दू में पुनर्लिखा।
यह बदलाव केवल माध्यम का बदलाव नहीं है। यह भाषा और सत्ता के संबंध को भी नए ढंग से देखने का अवसर देता है।
एक अंग्रेज़ी उपन्यास में उर्दू के पतन की कहानी कही जाती है; वहीं उर्दू में पुनर्लिखी गई पटकथा उस कहानी को उसकी अपनी भाषाई जमीन वापस देती हुई दिखाई देती है। इस रूप में फिल्म उर्दू को केवल मृत्यु की ओर जाती हुई भाषा के रूप में देखने के बजाय उसकी जीवित सांस्कृतिक क्षमता की ओर संकेत करती है।
यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर उभरता है: क्या उर्दू सचमुच मर रही है, या वह केवल उस पुराने सांस्कृतिक रूप में समाप्त हो रही है जिसे देवन और नूर याद करते हैं?
क्या उर्दू सचमुच मर गई है?
उपन्यास के अंत में उर्दू की मृत्यु का विचार एक गहरी विडंबना पैदा करता है। पात्रों की दुनिया में उर्दू लगभग मृत घोषित की जा चुकी है, लेकिन स्वयं In Custody इस भाषा को लगातार जीवित रखता है—पाठ, स्मृति, आलोचना और सांस्कृतिक बहस के माध्यम से।
शायद यही उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
किसी भाषा की मृत्यु केवल तब नहीं होती जब लोग उसे बोलना बंद कर देते हैं। वह तब भी मर सकती है जब उसके अनुयायी उसे वर्तमान से काटकर केवल अतीत की वस्तु बना देते हैं।
देवन उर्दू से प्रेम करते हैं, लेकिन वे उसे बदलते हुए संसार में नया जीवन देने में असफल रहते हैं। वे उसके कवियों को बचाना चाहते हैं, उसकी स्मृतियों को बचाना चाहते हैं, उसकी महानता को बचाना चाहते हैं—लेकिन उसके भविष्य की कल्पना नहीं कर पाते।
और यही उनकी त्रासदी है।
निष्कर्ष: उर्दू की मौत या हमारी स्मृति की?
In Custody को केवल उर्दू के पतन की कहानी के रूप में पढ़ना उसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह उपन्यास पूछता है कि जब कोई समाज आधुनिकता की ओर बढ़ता है तो वह अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों के साथ क्या करता है।
क्या परंपरा को संग्रहालय में सुरक्षित रखना पर्याप्त है?
क्या किसी भाषा से प्रेम करने का अर्थ केवल उसके गौरवशाली अतीत को याद करना है?
या फिर किसी भाषा के प्रति सच्ची निष्ठा यह है कि उसे नए अनुभवों, नए लेखकों, नई आवाज़ों और बदलती दुनिया के बीच जीवित रखा जाए?
देवन की यात्रा का सबसे मार्मिक पक्ष यही है कि वे उर्दू को बचाना चाहते हैं, लेकिन स्वयं उसके अतीत के भीतर कैद हैं। मिर्पोर और दिल्ली के बीच फैला हुआ उनका प्रतीकात्मक रेगिस्तान वास्तव में अतीत और वर्तमान, स्मृति और आधुनिकता, संरक्षण और परिवर्तन के बीच की दूरी है।
इसलिए In Custody केवल एक विलुप्त होती भाषा का शोकगीत नहीं है। यह एक चेतावनी भी है।
भाषाएँ केवल स्मृतियों में जीवित नहीं रहतीं। वे तब जीवित रहती हैं जब उन्हें बोलने वाले लोग उन्हें नए समय के साथ संवाद करने देते हैं। जब किसी भाषा को केवल उसके बीते हुए गौरव में बंद कर दिया जाता है, तो उसका सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं, भीतर से पैदा होता है।
इस अर्थ में, In Custody का प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है:
क्या उर्दू मर रही है—या हमने उसे उसके अतीत की हिरासत में कैद कर दिया है?