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जब प्रलय भी हँसती है: ‘ऑल क्वाइट इन विकासपुरी’ और हमारे समय की प्यास

जब प्रलय भी हँसती है: ‘ऑल क्वाइट इन विकासपुरी’ और हमारे समय की प्यास
  • PublishedJuly 12, 2026

अगर आप सोचते हैं कि प्रलय हमेशा आसमान से आग बरसने, ज़ॉम्बियों के शहरों पर कब्ज़ा करने या हॉलीवुड के महंगे स्पेशल इफेक्ट्स के साथ ही आती है, तो ज़रा दिल्ली की एक गर्म दोपहर में पानी की टंकी के नीचे लगी कतार देख लीजिए। वहाँ आपको समझ आएगा कि दुनिया का अंत हमेशा धमाके से नहीं होता—कई बार वह धीरे-धीरे, बाल्टी-बाल्टी खाली होती है।

यही बेचैन करने वाला, लेकिन हँसी में लपेटा हुआ सच सामने लाती है सारनाथ बनर्जी की ग्राफिक कथा All Quiet in Vikaspuri

प्रलय का भारतीय संस्करण

पश्चिमी साहित्य में प्रलय अक्सर वैश्विक आपदा का तमाशा होती है। बर्फ़ पिघलती है, समुद्र शहर निगल जाते हैं और आख़िरी इंसान किसी बंकर में बैठा मानवता बचाने की कोशिश करता है।

भारतीय कल्पना कुछ और कहती है। यहाँ प्रलय पहले नल में आती है। फिर टैंकर में। फिर चुनावी भाषण में। और अंततः टीवी की बहस में, जहाँ पानी से ज़्यादा शोर बहता है।

ऑल क्वाइट इन विकासपुरी इसी भारतीय प्रलय का दस्तावेज़ है। यह ऐसी दिल्ली की कहानी है जहाँ पानी केवल संसाधन नहीं, सत्ता है; व्यापार है; अफ़वाह है; और सबसे बढ़कर—जीवित रहने की आख़िरी शर्त है।

विकासपुरी: जहाँ विकास सबसे पहले गायब हो जाता है

विडंबना देखिए—जिस मोहल्ले का नाम विकासपुरी है, वही विकास के सबसे बड़े मज़ाक का मंच बन जाता है।

यह वही विकास है जो चौड़ी सड़कें तो बनाता है, लेकिन नदियों को नालों में बदल देता है। जो स्मार्ट सिटी के विज्ञापन छापता है, मगर पानी के लिए लोगों को आधी रात से लाइन में खड़ा कर देता है।

यहाँ विकास किसी उपलब्धि का नहीं, बल्कि एक ऐसे वादे का नाम है जिसकी पाइपलाइन कभी पूरी नहीं होती।

नायक नहीं, एक प्लंबर

बनर्जी का सबसे दिलचस्प निर्णय यह है कि दुनिया बचाने के लिए उन्होंने कोई सुपरहीरो नहीं चुना। उनका नायक गिरीश है—एक मानसिक शक्तियों वाला प्लंबर।

कितनी शानदार विडंबना है!

जब सभ्यता पानी खो देती है, तब वैज्ञानिकों, नेताओं और टीवी एंकरों से ज़्यादा ज़रूरी एक प्लंबर हो जाता है।

गिरीश की सरस्वती नदी की खोज किसी पुराण की यात्रा कम और आज के भारत की आत्मा की तलाश ज़्यादा लगती है। वह पानी ढूँढ़ रहा है, लेकिन दरअसल वह हमारी खोई हुई समझदारी खोज रहा है।

व्यंग्य: जब हँसी प्रतिरोध बन जाती है

पर्यावरण संकट पर लिखे अधिकांश साहित्य का स्वर गंभीर होता है। लेकिन बनर्जी जानते हैं कि लगातार डर सुनते-सुनते मनुष्य डरना बंद कर देता है।

इसलिए वे हँसाते हैं।

उनकी हँसी मनोरंजन नहीं, प्रतिरोध है।

वे मीडिया का मज़ाक उड़ाते हैं, राजनीति की पोल खोलते हैं, निजीकरण पर कटाक्ष करते हैं और उस विकास मॉडल को आईना दिखाते हैं जिसने नदियों को एक्सेल शीट की एक पंक्ति बना दिया है।

यह व्यंग्य पाठक को असहज करता है। क्योंकि हँसते-हँसते अचानक एहसास होता है कि मज़ाक किसी और पर नहीं, हम सब पर है।

चित्र जो चिल्लाते नहीं

ग्राफिक उपन्यासों में अक्सर चित्रों से चमत्कार पैदा किए जाते हैं। लेकिन बनर्जी की रेखाएँ जानबूझकर साधारण हैं। वे दृश्य को भव्य नहीं बनातीं।

क्यों?

क्योंकि पर्यावरण संकट किसी हॉलीवुड फ़िल्म का दृश्य नहीं है। वह हमारे रोज़मर्रा का हिस्सा है।

साधारण चित्र पाठक को यह कहने का मौका नहीं देते कि “यह तो केवल कल्पना है।”

वे धीरे से फुसफुसाते हैं—“देखो, यह तुम्हारा ही शहर है।”

असली खलनायक कौन?

इस कहानी में कोई एक राक्षस नहीं है।

खलनायक है—

  • पानी का बाज़ारीकरण।
  • विकास का अंधा उत्सव।
  • मीडिया का सतही तमाशा।
  • राजनीति की अल्पदृष्टि।
  • और हमारी सामूहिक सुविधा-प्रिय चुप्पी।

यानी प्रलय बाहर से नहीं आई। हमने उसे ठेके पर बुलाया।

पश्चिम की प्रलय, भारत की प्यास

जलवायु संकट पर पश्चिमी कल्पना अक्सर दुनिया के अंत की बात करती है।

भारतीय अनुभव पूछता है—

“दुनिया बचेगी या नहीं, यह बाद में देखेंगे। पहले बताइए, पानी कब आएगा?”

यही प्रश्न ऑल क्वाइट इन विकासपुरी को विशिष्ट बनाता है। यह वैश्विक संकट को स्थानीय भाषा, मिथकों, क्रिकेट, टीवी धारावाहिकों और दिल्ली की धूल में अनुवादित करता है।

यहीं इसकी सबसे बड़ी ताक़त है।

आख़िरी बाल्टी

इस पुस्तक को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि भविष्य अचानक नहीं आएगा। वह धीरे-धीरे हमारी आदतों में घुलेगा।

जब पानी बोतल से महँगा नहीं, बल्कि स्मृति से दुर्लभ हो जाएगा।

जब सरस्वती नदी केवल पुराणों में नहीं, गूगल मैप्स के “Not Found” में भी मिलेगी।

और जब विकासपुरी सचमुच “ऑल क्वाइट” हो जाएगी—क्योंकि वहाँ लड़ने के लिए भी पानी नहीं बचेगा।

शायद यही सारनाथ बनर्जी का सबसे तीखा व्यंग्य है।

प्रलय कभी केवल पृथ्वी का अंत नहीं होती।

कई बार वह हमारी कल्पना, हमारी राजनीति और हमारी संवेदनाओं का सूख जाना होती है।

और अगर हम अब भी मुस्कुरा रहे हैं, तो यह तय करना होगा—हम बनर्जी के व्यंग्य पर हँस रहे हैं, या उस भविष्य पर जो चुपचाप हमारी ओर बढ़ रहा है।

Written By
SChandraLiterature

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